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________________ स्या. क. टीका-हिन्दीविषेधन ] [ १९६ __ अन्यचित्त-चैतसिकागतेरसर्वार्थविषयोऽयं स्यादित्याशक्कापोहायाहपरचित्तादिधर्माणां गत्युपायाभिधानतः । सर्वार्थविषयोऽप्येष इति तद्भावसंस्थितिः ॥६४॥ परचित्तादिधर्माणाम् परचित्तालोचन-समुद्रोदकपलादिमानरूपाणाम् गत्युपायाभिधानतः= परिच्छेदोपायतपोभावनाघभिधानात्, सर्वार्थविषयोऽप्येषः प्रकान्त आगमः फलतः, स्वरूपतोऽपि सर्वामिलाप्यभावविषयः, इति एवम् तद्भाव स्थितिः सर्वजव्यक्तम्यारामस्य धर्माऽधर्मव्यवस्थापक. स्वसिद्धिः ।।६।। सत्तनिशितैः शरैरिव वरमर्मीमांसके दुर्जये लुष्टाके सुपथस्य मुष्णति धनं सर्वज्ञमस्तौजसि । तस्यैवावगमं च लुम्पति परे बाढ़ हते सौगते, साम्राज्यं जिनशासनस्व जयति न्यायश्रिया मुन्दरम् ।।१।। विश्वस्यापि दृशोर्मुद वितनुते यः प्रातिहार्यश्रिया, धर्मास्था यदुपज्ञमजमनसामद्याप्यवद्यापहा । दुयायोत्थकुवासनां नयशतलम्पन्ति यस्यागमाः, सर्वज्ञो गतिरामहोदयपदं सोऽयं कृताऽस्तु नः ॥२॥ [आगम से धर्माधर्म की व्यवस्था निर्याध] अन्य व्यक्तियों के चित्त और चित्तधर्मों का ज्ञान न होने से आगम सर्वार्थ विषयक नहीं हो सकता क्योंकि जिन बातों का ज्ञान आगम कर्ता को नहीं है, उस के द्वारा रचित आगम में उन बातों का समावेश सम्भव नहीं है। प्रस्तुत कारिका द्वारा इस शंका का निराकरण आगम में किया गया है । कारिका का अर्थ इसप्रकार है__पर चित्त और उन के धर्म तथा समुद्रोदफएल आदि का प्रमाणरूप सूक्ष्मतम पदार्थों के शान के तप-भावना आदि उपायों का प्रतिपादन किया गया है। इसलिए प्रस्तुत जैनागम फल और स्वरूप दोनों दृष्टि से सम्पूर्ण अभिलाप्य भावों का प्रतिपादक है, इसलिए सर्वज्ञ रचित आगम में धर्म और अधर्म की व्यवस्थापकता सिद्ध है । कारिका का आशय यह है कि तप और भावना आदि के द्वारा अन्य व्यक्तियों के चित्त और वित्तधर्मों का तथा अन्य सभी दुय पदार्थों का ज्ञान हो जाता है। आगम की रचना ऐसे ही सर्वश पुरुष द्वारा हुई है जिसे तप और भावना के अभ्यास से सम्पूर्ण वस्तुओं का शान प्राप्त है । अतः उस के द्वारा रचित आगम को धर्म और अधर्म का व्यवस्थापक मानने में कोई बाधा नहीं है ।। ६४ ॥ मीमांसक सा लुटेरा है कि जिसे जीतना बडा कठिन है। वह सुपथगामी जिनशासन के सर्वशरूपी धन की चोरी का प्रयास करता है किन्तु तीखे बाण जसे जिनसाशन के समीचीन उत्तम तर्कों से उस का ओज नष्ट हो जाता है। उस के अधगम को लुम करने में तत्पर बौद्ध भी जिनशासन के तर्कों से आहत हो जाता है जिन के फलस्वरूप न्यायश्री के सौन्दर्य से सम्पन्न होकर जिनशासन का साम्राज्य जगत के सामने विजेता के रूप में अद्भासित होता है । ___ जो तप आदि द्वारा अर्जित छत्र-चामरादि अतिशयित सुशोभनों की शोभा से सारे विश्व के नेत्रों को आनन्दित करता है, आज भी अशजनों के दुतों को दूर करने वाली धर्म के प्रति आस्था जिस की प्रथम देन है और जिस के आगम अपने सैकडो नयों द्वारा दुर्याय से उत्पन्न कृवासनामों का निराकरण करते हैं, महोदय पद की प्राप्ति तक यह कृतकृत्य सर्वज्ञ हमारी गति-शरण हो।
SR No.090423
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 9 10 11
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages497
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size16 MB
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