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________________ स्या. क. टीका-हिन्दीविवेचन } तत् सिद्धमेतदप्रामाण्यं स्वत एव केवलदृशां ज्ञप्ती, गुणापक्षणादुत्पत्तो परतः, स्वतश्च परतश्छाद्मस्थ्यमाजा पुनः । अभ्यासे च विपर्यये च बिदितं ज्ञप्तौ, समुत्पद्यते त्वन्यस्मादिति शासन विजयते जैन जगजिवरम् ।।१३॥१५॥ एवं सर्वज्ञग्रहादुपमानस्याप्यत्र प्रवृत्तिरित्याहहृद्गताशेषसंशीतिनिर्णयात् तद्ग्रहे पुनः । उपमान्यग्रहे तत्र न चान्यत्रापि चान्यथा ॥१६।। हृदताऽशेषसंशीतिनिर्णयात--स्वहृदयगताखिलसंदेहापनयनाद् हेतोः, तद्ग्रहे सर्वज्ञग्रहे सति पुनातदनन्तरम् अन्यग्रहे तथाविधान्योपलब्धौ सत्याम् , तत्र गृहीते सर्वज्ञे, 'अनेन सदृशोऽसो' इत्युपमानम् । तदनहे चोपमाऽप्रवृत्तौ न क्षतिरित्याह-न चान्यत्रापि च-गो-गवयानावपि च अन्यथा उभयदर्शनाभाव उपमासंभवः । उक्त विचारों से यह सिद्ध है कि-केवली-सर्वज्ञ को प्रामाण्य का ज्ञान स्वतः और प्रामाण्य का जन्म गुणापेक्ष होने से परतः होता है, किन्तु छद्मस्थ जीवों को अभ्यास दशा में प्रामाण्य का ज्ञान स्वत: और अभ्यास के अभाव में परत: पवं उत्पनि में भी परतः होता है। इस मान्यता के कारण ही जैन शासन जगत को जीतनेवाला, संसार का सर्वोत्कृष्ट शामन है ।१|| [सर्वसाधक उपमान प्रमाण] २६वीं कारिका में यह बताया गया है कि प्रमाणान्तर से सर्वक्ष की सिद्धि हो जाने पर अन्य सर्वज्ञ की सिद्धि जपमान प्रमाण से भी हो सकती हैं। कारिका का अर्थ इमप्रकार है सर्घक्ष के सम्बन्ध में हृदय में उदनेवाले सम्पूर्ण संशय का उन रीति से निराकरण होकर प्रमाण (अनुमान) द्वारा मर्वज्ञ की मिट्टि हो जाने पर उस के अनन्तर उस के सदृश अन्य सर्वज्ञ का ज्ञान होने पर पूर्वसिद्ध सर्वेक्ष में उपलभ्यमान सर्वज्ञ के माश्य को ग्रहण करनेवाले वह इस के सदृश है' इस प्रकार के उपमानप्रमाण की भी प्रवृति हो सकती है। अत: सर्वज्ञ की सर्वथा असिद्धिदशा में यदि उस में उपमान प्रमाण की प्रवृत्ति नहीं होती है तो कोई क्षति नहीं है. क्योंकि उपमेय और उपमान शोनों के दर्शन न होने की दशा में गो और गवय आदि में भी उपमान प्रमाण की प्रवृत्ति नहीं होती है। कहने का आशय यह है कि जैसे गो का ज्ञान होने के अनन्तर उस के महश गधय का दर्शन होने पर ही गौ में गययसादृश्य का उपमानजन्य बोध होता है. अन्यथा नहीं होता । इतने मात्र से गो-गवय आदि को उपमान का अविषय नहीं माना जाता किन्तु उपमान का विषय माना ही जाता है। उसी प्रकार अनुमान प्रमाण से पक सर्यक्ष की सिद्धि हो माने के अनन्तर उस के सश अन्य सर्वश का दर्शन होने पर पूर्वसिद्ध सर्वश में दृश्यमान सर्वश के सादृश्य का उपमानजन्य बोध हो ही सकता है। अतः उपमान पधं उपमेय भत सर्वज्ञ के अज्ञानदशा में उपमान प्रमाण से यदि सर्वज्ञ की सिद्धि नहीं होती तो इतने मात्र से उसे उपमान प्रमाण का अविषय नहीं कहा जा सकता । अतः यह मानना सथा उचित है कि सर्वश के साधन में उपमान प्रमाण भी सर्वथा पङ्गु नहीं है।
SR No.090423
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 9 10 11
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages497
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size16 MB
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