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________________ १०४ [ शास्त्रवार्त्ता० स्त० ८ श्लो० ७ क्योंकि प्रतियोगी से मुक्त भेद अनुभव विरुद्ध है श्रतः श्रनुयोगी में प्रतियोगी का प्रत्यक्ष सम्भव न होने से तद्घटितभेदस्वरूप का भी प्रत्यक्ष नहीं हो सकता ।' यह मत निरस्त इस प्रकार है कि भेद अधिकरणात्मक होता है अत एक किसी भी भाव का प्रत्यक्ष होने पर तत्स्वरूप तदाश्रित भेद का भी प्रत्यक्ष होना अनिवार्य है । जो भेद को प्रतियोगिघटितमूत्तिक कहा गया है उसका अभिप्राय यह है कि त्वरूप से भेदग्रहण प्रतियोगिग्रहण के बिना नहीं हो सकता । अतः यह कथन तर्कहीन है कि'यतः घटादि में पटादि का ग्रहण नहीं होता अत एव पटादिघटितमूत्तिक पटादिभेद का भी ग्रहण नहीं हो सकता ।' क्योंकि पटादिभेद पटाद्यात्मकता का विरोधी है, अत एव जिस अधिकरण में भेद का ग्रहण होता है उसमें पटाद्यात्मकता के ग्रहण की अपेक्षा नहीं होती, क्योंकि उसका ग्रहण भेदग्रह् का विरोधी है। किन्तु पटादिभेदस्वरूप से भेदग्रहण के लिये पटादि को पटत्वादिरूप से प्रतीति अपेक्षित होती है जो अनुयोगी से पृथक् हो जाती है । [ देशकालभेदमूलकता में अनवस्था दोष का प्रतिक्षेप | पक्ष में जो यह दोष दिया जाता है कि- "वस्तुभेद को देश कालभेदमूलक मानने पर अनवस्था होगी, क्योंकि देश कालादि का भेद भी अन्य देशकालाविमूलक ही मानना पड़ेगा ।" यह कथन तो प्रभेद पक्ष में भी समान है, क्योंकि अभेद का देशकालभेदमूलक भेद का प्रभाव प्रर्थ करने पर वेशकाल मेद में अनवस्था होने से उसके अभाव में भी अनवस्था का होना अनिवार्य है । यदि भेद का अर्थ 'देशका संक्यमूलक ऐक्य' किया जायगा तो देशकाल में देशकाल के अमेव को भो अन्य देशकालैक्यमूलक मानने से अनवस्था होगी। एवं सम्पूर्ण विश्व में ब्रह्माभेद मानने पर भी अनवस्था होगी। क्योंकि ब्रह्माभेद में वही ब्रह्माभेद मानने पर श्रात्माश्रय होगा, अतः ब्रह्माभेद में अन्य ब्रह्माभेव मानना होगा । इसीप्रकार उसमें भी अन्य ब्रह्माभेद मानना होगा- इसप्रकार अनवस्थित ब्रह्माद की कल्पना अपेक्षित होने से अभेदपक्ष में भी श्रनवस्था अपरिहार्य है । एकस्य ह्यात्मकत्वायोगादन्यतर मिथ्यात्वावश्यकत्वे भेदानामेव मिथ्यात्वमिति तु विपरीतम्, नानाभेदानां मिथ्यात्वकल्पनापेक्षयैकस्याऽभेदस्यैव तत्कल्पनौचित्यात्, अन्यथा सर्वत्र सन्मात्राऽभेदनिश्चये कालभेदाभावेन 'सोऽयम्' इत्यवमर्शाभावेऽपि तद्भेदे घट-पटयोः 'सोऽयम्' इत्यवमर्शप्रसङ्गात् । न च देशान्तरस्थघटादिभेदानुगतत्वात् सद्रूपताया: पारमा थिकत्वम्, भेदानां तु प्रच्यवाद् न तथात्वमिति तत्प्रच्युतिं परिगतस्यानुगतत्त्वस्य तदभावेऽभानात् प्रातिभासिकस्यानुगतत्वस्योभयत्र तुल्यत्वात् प्रत्यभिज्ञानादपि नान्वयि सद्रूपत्वम्, निरासात् इत्यादि वदता पर्यायास्तिकनयानुसारिणा गले गृहीतः कांदिशीक: कां दिशमनुसरेत् १ । [ अभेदमिथ्यात्वकल्पना में लाघत्र ] भेदपक्ष के विरोध में जो यह बात कही गयी थी कि 'एकवस्तु मेवामेव उभयात्मक नहीं हो सकती । अतः यदि किसी वस्तु में उस का मेव अभेद दोनों प्राप्त हैं तो किसी एक को मिथ्या मानना आवश्यक होगा। ऐसी स्थिति में भेद को मिथ्या मानना ही उचित है क्योंकि भेद श्रनन्त
SR No.090422
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 8
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages178
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size6 MB
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