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________________ स्या० का टीका एवं हिन्दी विवेचन ] . अथ यदधिकरणवृत्तिप्रतियोग्युपलम्भकातिरिक्तानवच्छिन्नं यत्सत्रमुपलम्भन्याप्यमिति वाच्यम्, गन्धवदणुभिन्नत्यादिकं च न प्रतियोग्युपलम्भकमिति न दोपः, यद्धर्मावच्छिन्नसच यद्धर्मावच्छिन्नोपलम्भव्याप्यं तदभमाच्छन्नोपल भाभावस्य सविच्छिन्नापात्रमत्यक्षहेतुत्वाद् न गुरुत्त्रवद्घटाभावादिप्रत्यक्षता, न वाकाशादिभेदस्य तथान्त्रम् , शब्दाश्रयत्वादेश्योग्यत्वात् । न चा घटत्वात्यन्ताभावस्य, घटेतरावृत्तित्वघटितत्वेनाऽयोग्यत्वात् । शूद्रादों ब्राह्मणत्वाभावस्तु सुत न प्रत्यक्षा, तदधिकरणवृत्तिप्रतियोग्युपलम्भकमात्रावच्छिन्नेन तत्सत्वेनापादयितुमशक्यस्वान् , तत्र विशुद्ध मातापितृजन्यत्यज्ञानस्यापि व्यञ्जकत्वात् । न चैवं तमस्यालोकनियतघटायभावप्रत्यक्षापत्तिः, तत्र प्रतियोगिसवस्यैव व्याप्यत्वादिति वाच्यम्: प्रतियोगिसत्त्वस्योपलम्भव्याप्यतायां निरुपाधिसहचारातिरिक्ततकवचस्य विवक्षितत्वात , प्रतियोग्युपलम्मकावच्छिन्नतत्सत्त्वस्य व्याप्यतायाँ कार्यकारणभावस्यापि तर्कत्वात् । न चैवमभावानुपलब्धिर्भाचप्रत्यक्षेऽपि हेतुः स्यात् , भावज्ञानस्य निर्विकल्पादेरधिकरणानिश्रितस्याप्युत्पादार्थ तत्र महत्त्वादेरेव हेतुत्वस्वीकारातः इति चेत् । [प्रतियोगी उपलम्भकभेदघटित व्याख्या का पूर्वपक्ष ] यदि यह कहा जाय कि "यदधिकरणवृत्तिप्रतियोग्युपलम्भक भिन्न विशेषण से विशिष्ट प्रतियोगोसत्त्व जिस प्रभाव के प्रतियोगी के उपलम्भ का व्याप्य हो यह अभाय तदधिकरण में प्रत्यक्षयोग्य होता है, तो उक्त दोष नहीं होगा, क्योंकि गन्धवदणभिन्नव जलपरमाणुरूप अधिकरण में बत्ति होने पर भो प्रतियोग्युपलम्भक नहीं है अतः वह यदधिकरणवृत्तिप्रतियोग्युपलम्भक से भिन्न विशेषण हुआ। एवं महत्त्व प्रतियोगी का उपलम्भक है किन्तु जलपरमाणु में पत्ति नहीं है अत एव वह भी यदधिकरणबृत्तिप्रतियोग्युपलम्मक से भिन्न विशेषण हुमा, इन दोनों विशेषणों से अधिशेषित पृथ्वीस्वरूप प्रतियोगी को सत्ता पृथ्वीत्वोपलम्भ का व्याप्य नहीं है। अतः जलपरमाणु में पृथ्वोत्थामाव के प्रत्यक्ष का आपादान नहीं हो सकता। प्रस्तुत योग्यता के फलस्वरूप यह कार्यकारणभाष फलित होता है कि उक्त रीति से (यधिकरणवत्तिप्रतियोगीउपलम्भकातिरिक्तविशेषणानवछिन्न यत्किञ्चविशेषणावच्छिन्न ) पद्धविच्छिन्न प्रतियोगी को सत्ता यद्धर्मावच्छिन्न प्रतियोगी के उपलम्भक की व्याप्य हो तचविच्छिन्दप्रतियोगी का अनुपलम्भ तद्धर्मावच्छिन्नाभाव के प्रत्यक्ष का हेतु है । इसलिये 'गुरुत्वषद्घटो नास्ति' इस प्रकार के गुरुत्ववद्घटाभाव के प्रत्यक्ष की आपत्ति नहीं हो सकती क्योंकि उक्तविधगुरुत्ववघटत्वावछिन्न की सत्ता गुरुत्ववघटत्वावछिन्न के उपलम्भक की व्याप्य नहीं है क्योंकि गुरुत्व अतीन्द्रिय होने से गुरुत्वसहितघट फा उपलम्भ नहीं होता। इसी प्रकार आकाशभेद का भी प्रत्यक्ष नहीं हो सकता क्योंकि आकाशभेद का प्रतियोगितावच्छेदक शम्बाश्रयत्व है-वह चक्षु से अग्राह्य शब्द से घटित है। प्रत एव शब्दाश्रयत्वविशिष्ट का चाक्षुषोपलम्भ असिद्ध होने से काशरूप प्रतियोगी की सत्ता भी शब्दाश्रयत्वविशिष्ट प्रतियोगी के उपलम्भ की व्याप्य नहीं है । एवं इसी प्रकार घटत्वात्यन्ताभाष रो अयोग्य हो जाता है क्योंकि उसका प्रतियोगिता का -
SR No.090420
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 5 6
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages231
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size7 MB
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