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________________ स्याक टोका एवं हिन्दी विवेचन ] । अध्यक्षमूलक होता है। अतः अध्यक्ष के अभाव में अर्थाभाव से व्याप्य निर्दोष लिङ्ग की उपलब्धि नहीं हो सकती ॥२॥ तीसरी कारिका में अनुपलब्धि प्रमाण से अर्थाभाध की सिद्धि को सम्भावना को व्यक्त किया गया है स्वभावकार्यलिङ्गकयोरनुमानयोरत्राभावेऽप्यनुपलब्धिरेव तत्र मानम् , इत्याशङ्कतेमूलम्-उपलब्धिलक्षणप्राप्तोऽर्थो येनोपलभ्यते । सतश्चानुपलब्ध्यैव तदभावोऽवसीयते ॥३॥ येन कारणेन उपलब्धिलक्षणप्राप्तोऽर्थः-बाह्यो घटादिः, परनीत्योपलभ्यते, ततश्चानुपलध्यैव = अदर्शनरूपया, तदमायः = बाह्यार्थाभावः अवसीयते ॥ ३ ॥ यद्यपि स्वभावलिङ्गक और कार्यलिङ्गक अनुमान से प्रभाव की सिद्धि सम्भव नहीं किन्त अनुपलब्धि प्रमाण से बाझो अर्थ के प्रभाव का निश्चय हो सकता है क्योंकि योग्यानुपलरिध अभाव की बोधक होती है और घटादि बाह्यार्थ अन्य मत से प्रत्यक्षयोग्य के लक्षण से सम्पन्न है। अतः उसकी अनुपलब्धि प्रदर्शन योग्यानुपलब्धिरूप है। इसलिये उससे बादार्थ के अभाव की सिद्धि अनिवार्य है ॥३॥ चतुर्थो कारिका में सामार्थ के अभाव का अनुपलब्धिमूलक सिर का निराकरण किया गया हैअत्रोचरमधिकृत्याहमूलम्-उपलब्धिलक्षणप्राप्तिस्तोत्वन्तरसंहतिः । तेषां च तत्स्वभावत्वे तस्याऽसिद्धिः कथं भवेत् ॥४॥ उपलब्धिलक्षणप्राप्तिरिह परेपा सत्वन्तरसंहतिः प्रतियोगि-प्रतियोगिव्याप्येतस्यावरप्रतियोग्युपलम्भकसमवधानम् । तेषां च = तदपराभिमतघटाधुपलम्भकानां तत्स्थानाभिषिक्तप्रत्ययान्तराम वा, तत्स्वभावत्वे = बाह्यापिलम्भजननस्वभावत्वे त्वथाभ्युपगम्यमाने, सदसिद्धि = बाह्याऽसिद्धिः, कथं भवेद् ? तदुपलम्भजननस्वभावहेतुसाकल्यविरोधात, बाह्यार्थग्य ज्ञानजनकत्वायत्त्या त्या प्रतियोगि-प्रतियोगिव्याप्येतरत्वस्य निवेशयितुमशक्यत्वात् , तत्स्थाने तदुपलम्भजनकसमनन्तरान्यत्वनिवेशेऽपि सामग्र्यननुप्रविष्टाना हेतुत्वोपगमेऽपसिद्धान्तात् ॥४॥ [विज्ञानवाद में प्रतियोगि अनुपलब्धि की दुर्घटता ] पर मत में उपलब्धिलक्षण को प्राप्ति यह प्रतियोगी को प्रत्यक्षयोग्यता रूप है जो अन्य समस्त हेतुओं का सानिधान रूप है । अर्थात् बाह्यार्थबादी के अनुसार प्रतियोगो एवं प्रतियोगिव्याय से इतर प्रतियोगी के प्रत्यक्ष में जरूरी सम्पूर्ण कारणों का सन्निधान ही योग्यता है। इस योग्यता के रहने पर यदि प्रतियोगी को उपलब्धि नहीं होती है तो निश्चय ही यह अनुपलब्धि प्रतियोगी के अभाव होने से ही होती है, अन्यथा प्रतियोगी के उपलम्भक अन्य सभी कारणों के साथ यदि प्रति
SR No.090420
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 5 6
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages231
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size7 MB
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