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________________ स्याक टीका एवं हिन्दी विवेचन ] १६१ कल्पना हो सकती है-जैसे तेजःसंयोगमात्र से जन्य विजातीय चित्ररूप में विजातीय तेजःसंयोग कारण है एवं पाक और रूप उभयजन्यविजातीयचित्र में पाक और रूप दोनों कारण है-अथवा तेजःसंयोगमात्रजन्य और पाकरूपोभयजन्य चित्र रूपों का रूपमात्रजन्यभिन्नत्वरूप से अनुगम कर जन दोनों के प्रति रूपमात्रजन्य से भिन्न चित्ररूप के प्रति विजातीय तेजःसंयोग कारण है । इसप्रकार उन दोनों रूपों के प्रति एक कारण को कल्पना की जा सकती है। क्योंकि फल के बल से वैजात्य की कल्पना हो सकती है। यदि यह शंका की जाय कि- जैसे तेजासंयोगमात्रजन्य और पाकरूपोभयजन्य चित्ररूपों का रूपमात्रजभिन्नत्वरूप से अनुगम कर उन दोनों के प्रति यानी रूपमात्रजभिन्न के प्रति विजातीयतेज:संयोग में एक कारणता को कल्पना की जाती है, उसोप्रकार रूपमात्रजन्यविजातीयचित्र औ रूपोमयजन्य विजातीयचित्र इन दोनों का अग्निसंयोगमात्रजभिन्नत्यरूप से अनुगम कर उन दोनों के प्रति पानी अग्निसंयोगमात्रजभिन्न रूप के प्रति रूप कारण है यह कल्पना भी क्यों न की जाय ?'-तो यह शंका उचित नहीं है क्योंकि रूप में रूपत्वेन कारणता मानने पर नीलमात्रारब्धघट में भी चित्ररूप को आपत्ति होगी और नीलपीतेतररूपत्वाविना कारणता मानने पर पाक और रूप उभयजन्य चित्र में व्यभिचार होगा-जैसे, नोलकपालमात्रारम्धघट के एकभाग में पाक से नीलरूप का नाश होकर उस में पोसजनक अग्निसंयोग होने पर एक कपालगत नीलरूप और अन्यकपालगत पोतजनकाग्निसंयोग से घट में चित्ररूप की उत्पत्ति होती है किन्तु उस के पूर्व नीलेतररूप स्वाश्रयसमवेतत्त्वसम्बन्ध से घट में इ है। तथा यह आपत्ति यानी अग्निसंयोगमात्रजभिन्नचित्ररूप में रूपकारणता को आपत्ति चित्ररूप के प्रति नौलाभावादिषटकको कारणलाबादी के मत में होगी, क्योंकि पाक मोर रूप उभयजन्य चित्ररूप में नीलाभावादि षट्क को कारणता का व्यभिचार नहीं है। नोलपीतेतररूपादि को चित्ररूप के प्रति कारणतावादी तो यह भी कह सकता है कि पाकमात्रजन्यचित्ररूप में कोई प्रमाण नहीं है क्योंकि जहाँ पाकमात्र से चित्ररूप की उत्पत्ति होने का अनुभव होता है वहाँ यह मानने में लाघव है कि पाक से अवयव में अनेक रूपोत्पत्ति के बाद ही अवयवो में चित्ररूपोत्पत्ति होती है । इस पर यदि यह शंका की जाय कि-' अवयवी में चित्ररूप का अनक जो पाक है उसको अवयव में नील पोताव का जनक मानने पर नीलपीतादि के जनकतावच्छेवक जाति में सांकर्य होगा क्योंकि चित्ररूप के अमनक नीलजनक प्रग्निसंयोग में नीलजनकतावच्छेदक जाति है किन्त पीतजनकतावच्छेधक माति नहीं है, ऐसे हो चित्रहप के प्रजनक पोतजनहानियोग में पीतजनकतावच्छेवक आति है किन्तु नीलमनकतावच्छेदक जाति नहीं है और वे दोनों जाति चित्रजनक अग्निसंयोग में विद्यमान है-" तो यह भी ठीक नहीं है क्योंकि चित्रजनक पाक और नीलपीतादिजनक पाक भी विभिन्न है। अतः चित्र में नोलपीतेतरा विरूप को कारण मानने में कोई आपत्ति किन्तु नव्य नैयायिक को मोर से कहा जा सकता है कि विचार करने पर अतिरिक्त चित्ररूपवावी का यह मत युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता । क्योंकि चित्ररूपोत्पत्तिस्थल में अवयवी में नीलादिरूप की उत्पादकसामग्री भी विद्यमान रहती है। अत: चित्रावयवी में नीलादि की उत्पत्ति की प्रापत्ति का वारण करने के लिये समवाय सम्बन्ध से नीलादि के प्रति नोलेतररूपादि स्वाश्रयसमवेतत्वसम्बन्ध से प्रतिबन्धक है ऐसी कल्पना करनी पड़गी जिसमें गौरव होगा। [नयमत समाप्त ]
SR No.090420
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 5 6
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages231
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size7 MB
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