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________________ १६२ शास्त्रवातात. ६ श्लो० ३७ तन्नेति संप्रदायानुसारिण:-अव्याप्यवृत्तिनीलादिकल्पन एव गौरवात् । तथाहिंअवच्छेदकतासंबन्धेन नीलादिकं प्रति समवायेन नीलेतररूपादीनां प्रतिबन्धकत्वं वाच्यम् , अन्यथा पीतावयवावच्छेदेन नीलोत्पत्तिप्रसङ्गात् । न च नीलस्य स्वाश्रयावच्छेदेन नीलजनकत्वस्वाभान्यादेव न तदापनिरिति वाच्यम् , विनताशप्रतिवध्यप्रतिबन्धकमावं तथास्वाभाज्या:निवादात् । ननु समवायेन नीलं जायत एव पीतावयवावच्छेदेनेत्यत्र चापादकाभाव इति चेत् १ न, समवायस्येवावच्छेदकताया अपि कारणनियम्यत्वात् । एवं च नीलादो नीलेतररूपादीनां, नीलेतररूपादौ वा नीलादीनां प्रतिवन्धकत्वे विनिगमकाभावः, मम तु नीलेतररूपादौ नीलादीनां न प्रतिबन्धकत्वम् , नील-पीतारब्धे पीतरूपत्त्रप्रसङ्गस्य बाधकरवात् । अथ ममापि नीलत्वादिकमेव प्रतिवध्यतावच्छेदकम् , न तु नीलेतररूपत्वादिकम् , गौरवात् । न च नीलत्वेन प्रतिबन्धकत्वम् न तु नीलेतरत्वेन, गौरवात , इत्येव कि न स्यात् ? इति वाच्यम् , प्रतिबन्धकतावच्छेदकगौर वस्याऽदोपस्यात् ।। [ नव्यमतानुसार अध्याप्यवृत्तिरूप कल्पना में गौरव-प्राचीन मत ] साम्प्रदायिक नैयायिकों का इस संदर्भ में कथन यह है कि अतिरिक्त चित्ररूप पक्ष में गौरव नहीं है, किन्तु अव्याप्यवत्ति नीलादिरूपों की उत्पत्तिपक्ष में होगौरव है। जैसे-इस पक्ष में अवच्छेचकता सम्बन्ध से नीलाविरूप के प्रति समवायसम्बन्ध से नोलेतररूप को प्रतिबन्धक मानना आवश्यक है, अन्यथा पीतावयवावच्छेदेन भी अवयवो में नीलरूप की उत्पत्ति का प्रसङ्ग होगा। यदि यह कहा जाय कि- "नील में स्वाश्रयावच्छेदेन ही नीलजनन का स्वभाव है। इसलिये पीतादिमाग में नीलोत्पत्ति का प्रसङ्ग नहीं हो सकता है"-तो यह ठीक नहीं है क्योंकि उक्त प्रतिबध्य. प्रतिबन्धकभाव माने बिना नीलावि में उक्तस्वभाव की सिद्धि ही नहीं हो सकती। यदि यह कहा जाय कि- "नील समवायसम्बन्ध से उत्पन्न होता ही है किसु पीतभाग में अवच्छेदकता सम्बन्ध से नोलोस्पत्ति का कोई आपादक न होने से पीतभाग में अवच्छेदकता सम्बन्ध से नीलोत्पत्ति का प्रसङ्ग नहीं हो सकता"- तो यह ठीक नहीं है क्योंकि समवाय जैसे कारण से नियम्य होता है उसी प्रकार प्रयच्छेइकता भी कारणनियम्य होती है अतः यह कहना कि 'नील समवाय से ही उत्पन्न होता है' उचित नहीं है क्योंकि अवच्छेदकता सम्बन्ध से नील को उत्पत्ति न मानने पर अवयवी में उत्पन्न होने वाले नोल रूप को नील अवयव में भी अवच्छेदकता न हो सकेगी । अतः इस स्थिति में जैसे अवच्छेदकतासम्बन्ध से नोलादि के प्रति समवायसम्बन्ध से नीलेतर रूपावि में प्रतिबन्धकता होती है उसोप्रकार, कोई विनिगमना न होने से अवच्छेदकता सम्बन्ध से नीलेतररूपादि के प्रति नीलादि में भी प्रतिबन्धकता सिद्ध होगी । इसलिये इस मत में दो प्रतिबध्य-प्रतिबन्धक भाव को कल्पना में गौरव है । चित्ररूपवादी के मत में यह गौरव नहीं हो सकता। क्योंकि उन के मत में समवाय से नोलादि के प्रति स्वाश्रयसमवेतत्व सम्बन्ध से नीलरूपादि ही प्रतिबन्धक होगा । किन्तु समवाय से नीलेतररूपावि के प्रति स्वाश्रयसमवेतस्व समबन्ध से नीलादि को प्रतिबन्धक मानने की आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि इस दूसरो प्रतिबन्धकता को मानने पर नोलापीतारन्ध घट में नोरूपस्य की
SR No.090420
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 5 6
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages231
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size7 MB
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