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________________ १६० [शास्त्रवा•ि स्त० ६ श्लो० ३७ हो जामे पर एक साथ ही सभी अवययों में नील-पीतादि विभिन्न रूपों की और प्रवयवी में चित्ररूप की उत्पत्ति होती है, यह उत्पत्ति चित्ररूप के प्रति मोले-तर-पीतेतरावि को हेतु मानने पर नहीं घट सकेगी। अथ रूपजन्यतावच्छेदकं विजातीयचित्रत्वम् , अग्निसंयोगजन्यतावच्छेदक चापरम् , अग्निसंयोगजचित्रं प्रत्यवच्छेदकत्वसंबन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताका नीलजनकाग्निसंयोगादेरभावा उक्तप्रत्यासत्या हेतवः, रूपजनकविजातीयाग्निसंयोगोऽपि, इति न वायवादौ तदापत्तिः । अस्तु वा तेजःसंयोगमात्रजन्ये विजातीयचित्रे विजातीयतेजःसंयोगस्य, पाकरूपोभयजन्ये विजातीयचित्रे चोभयोरेव हेतुत्वम् , रूपमात्रजातिरिक्त एव वा विजातीयतेजःसंयोगो हेतुः, फलवलेन जात्यकल्पनात् , अग्निसंयोगमात्रजातिरिक्ते रूपहेतुताया वक्तुमशक्यत्वात , नीलेतादिसमाजाभावात , नीलाभावादिहेतुतावादिन एवात्र वैयरथयात् । पाकजचित्रे वा मानाभावः, पाकादवयवे नानारूपोत्पत्त्यनन्तरमेवावयविनि चित्रस्वीकारे लायवात् । न चावयविनि चित्रजनकत्वाभिमतस्य पाकस्यावयवनील-पीतादिजनकरवे नील-पीतादिजनकत्वावच्छेदकजातिसांकर्यम् , तत्र पाकनानात्वस्वीकारादिति चेत् ! न, चित्रस्थले नीलादिसामधीसत्त्वाद् नीलाद्यापत्तिवारणाय नीलादौ नीलेतररूपादेः प्रतिबन्धकत्वकल्पने गौरवात्-इत्याहुः । [एक चित्ररूपबादी की ओर से पुनः स्वपक्ष स्थापन ] इस संदर्भ में यदि यह कल्पना की जाय कि "चित्ररूप की दो जाति होती है-एक रूपजन्यतावच्छेदक और दूसरी अग्निसंयोगजन्यतावच्छेदक । इन में अग्निसंयोगजन्यचित्ररूप के प्रति अवच्छेदकत्वसम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिताक नोलजनकाग्निसंयोगादि का अभाव स्वाश्यसमवेतत्वसम्बन्ध से कारण है और रूपजनक विजातीयप्रग्निसंयोग भी कारण है। ऐसा मानने पर पाकमात्र से चित्र पोत्पत्ति में कोई बाधा नहीं हो सकती क्योंकि जिस द्रव्य में पाकमात्र से चित्ररूप उत्पन्न होता है उसके विभिन्न उन्हीं अवयवों में नीलपीतादिजनकग्निसंयोग होता है जिन में नीलीतादि की उत्पत्ति होती है। अतः अबच्छेदकतासम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिताक नोलादिजनका िनसंयोगाभाव पीतादिभाग में रहेमा, एवं पीतादिजनकाग्निसंयोगाभाव नीलादि में रहेगा। इस प्रकार नोलपीतादिजनकाग्निसंयोग का अवछेदकतासम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिताक प्रमावस्वाश्रयसमवेतत्वसम्बन्ध से अधययी द्रव्य में रहने से उस में पाफ मात्र से चित्ररप की उत्पत्ति होने में कोई बाधा नहीं हो सकती। रुपजनक विजातीय प्रग्निसंयोग को भी उन अभावों का सहकारो मानने से वायु प्रादि में चित्ररूपो. स्पति का प्रसंग भी नहीं हो सकता, क्योंकि यद्यपि वायु के अवयवों में अवच्छेदकतासम्बन्घावच्छिन्न प्रतियोगिताक नोलपोतादिजनकाग्निसंयोग का अभाव रहने से उक्त प्रभाव स्वाथ्यसमवेतत्व सम्बन्ध से वायु में विद्यमान है किन्तु रूपजनक विजातीयअग्निसंयोग उस में न होने से चित्ररूपोत्पत्ति उस में नहीं हो सकती क्योंकि अग्निसंयोग का जन्यतावच्छेदक चित्रत्व निसंयोग के जन्यतावच्छेवकरूपत्वकाथ्याप्य धर्म है और ट्याग्यधर्मावच्छिन्न कार्य की उत्पत्ति में व्यापकधर्मायच्छिन्न कार्ष की उत्पादक सामग्री प्रयोजक होती है। अतः रूपत्वावच्छिन्न का कारण विजातीयाग्मिसंयोग वायु में न होने से उस में चित्ररुपोत्पत्ति का प्रसङ्ग न हो सकेगा। इस के अतिरिक्त एक और भो
SR No.090420
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 5 6
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages231
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size7 MB
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