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________________ १३४ [ शास्त्रवा०ि स्त० ६ इलो० ३० लिततावत्कारणसमवधानाऽसामग्रीभावात् । न चेतरकारणविशिष्टचरमकारणमेव मा. न च विनिगमनाविरहः, कार्यकर्दशताया विनिगमकत्वादिति वाच्यम् , इतरेषामपि कयाचित् प्रत्यासत्त्या कायदेशत्वात् , अन्यथा चरमकारणे तवशिष्ट्यानिरुक्तेः । न च चरमकारगमेव सा, तस्य संयोगत्वादिनाऽसामग्रीहाल, चरपत्वेन तत्त्वे दाऽव्यवहितपूर्ववतिना संबन्धन फलविशिष्टोस्पत्तिकत्वं तदिति लावाद तेज संघन्धेन फलवस्यन सामग्रीयौचित्यात । एवं च 'सामनस्यभावात् कार्याभावः' इत्यत्र फलतः 'स्वाभाषादेव स्वाभावः' इति सामग्रीभेदात् कार्यभेद इत्यत्र च फलतः स्वभेदादेव खभेद इत्यापतितमिति न किञ्चिदेतत् । एतेन 'पागभावतरकादाचित्कयावत्कारणवागभावानाधारः कार्यप्रागभावाधारः क्षण एवं सामग्री, नेयं कार्यजनिका, किन्तु तब्द्याप्या, कार्याधिकरणीमृतस्य अणस्य कार्यप्रापभावनाधरणलात, तदधिकरणीभूतस्य च कार्यानधिकरणत्वान, अधिकरणीभूतानामेव च कालोपाधीना हेतुत्वात्' इत्यपि निरस्तम्, एतस्यास्तत्र तदुत्पत्तावनियामकत्वादिति । [ सामग्री के निर्वचन का असम्भव-पूर्वपक्ष ] ___ यदि बौद्ध को ओर से अपने पक्ष के समर्थन के लिये यह युक्ति प्रस्तुत की जाय कि-'दण्डघटादि क्षण को कुर्वपत्व से कारण मामने पर दण्ड-घटादि रूप सभी फुर्वपक्षणों को घटकुवंद्रूपत्वस्वरूप अनुगत धर्म के द्वारा घट का व्याप्य यानी घट का उत्पादक माना जा सकता है, किन्तु स्थैर्यवादी के मत में दण्ड प्रादि को दण्डत्व प्रादि रूप से घट के प्रति कारणता होती है । अत: दण्डादिसमूह को 'एक विशिष्ट अपरत्व'रूप से घट का उत्पादक मानना होगा। तो फिर सामग्री घटक दण्डचक्रावि कारणों के अवच्छेद्य-अवच्छेदकभाव यानी विशेष्य-विशेषण भाव में विनिगमनाचिरह होने से गुरुरूप से अनेक उत्पादकता की कल्पना करने में गौरव होगा। यदि इस गौरव के परिहार के लिये घटसामग्रोत्व रूप से दण्ड-चकादि को घटव्याप्य यानी घटोत्पादक माना आय तो यह सम्भव नहीं है क्योंकिसामग्रीत्व का निवजन नहीं हो सकता । जैसे . .. यदि समस्त कारणों को सामग्री माना जायगा तो जिस कार्य के कारण, क्रम से प्रादुर्भूत होते हैं और उनका कहीं युगपत् समवधान नहीं हो पाता, ऐसे कारणों के समुदाय में सामग्नीलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। यदि एकक्षणात यावस्कारणों को सामग्री माना जायगा तो स्वर्गादि सामग्री में अव्याप्ति हो जायगी क्योंकि स्वर्ग के कारणभूत यज्ञ इच्छात्मक होने से चिरपूर्व में प्रतीत हो जाने के कारण वह स्वर्ग के अन्य कारणों का समानक्षणवृत्ति नहीं हो सकता। ___ यहां यदि स्थैर्यवादी को ओर से यह कहा जाए कि “एकक्षण में ग्रावत् कारणों का समवधान ही सामग्री है, तथापि स्वर्गादि सामग्री में अव्याप्ति नहीं हो सकती, कारण यह ज्ञातव्य है कि कार्योत्पत्ति के पूर्व किन्हीं कारणों का तो साक्षात् समवधान होता है और किन्हीं कारणों का व्यापार द्वारा होता है। तो इस प्रकार लाक्षात और व्यापार द्वारा दोनों रूप में होने वाला समधान एक ही क्षण में यावत्कारणों का समवधान कहा जाता है। स्वर्गोत्पत्ति के पूर्व यज्ञ का स्वयं समवधान न होने पर भी उसके व्यापार का समयधान होता है ....
SR No.090420
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 5 6
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages231
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size7 MB
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