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________________ १२० [ शास्त्रवा० स्त० ६ लो० १६ त्मकता असंक्लिष्ट चित्त के कारण और शिशपामा के कारण से अतिरिक्त कारण आर्थिक नहीं है,-इन दो में कोई धिनिगमक नहीं है। प्रतः जैसे संक्लिष्टचित्त के जनन में और चलशिशपा के जनन में प्रसंक्लिष्टचिसक्षण को और शिरापाक्षण को अन्य सहकारी की अपेक्षा है उसी प्रकार शिलन्टचिर और सबल के जनक हो भी अन्य सहकारी को अपेक्षा अर्थात् सहकारी की आवश्यकता अपरिहार्य है। दूसरी बात यह है कि सहकारी से उत्पन्न होने वाला विशेष जो अग्रिमक्षणपरम्परा में कान्त होता है इसका परित्याग हये विना विशेषान्तर का उदय नहीं होता, जसे दण्ड-चक्रादि सहकारी द्वारा मत्पिड या मद्रव्य में प्रसूत घटाकार रूप विशेष जो अग्रिम अनेक क्षण परम्परा में अनुवर्तमान होता है उसका परित्याग होने पर ही कपालरूप विशेषान्तर का उदय होता है। इस प्रकार विशेषान्तर के उदय के लिये पूर्वविशेष का जो परित्याग अपेक्षित होता है वह स्वभावतः न होकर मुद्गरादिसदृश अन्य कारण से ही होता है । अलः नाशहेतु की सिद्धि अनिवार्य है । इस विषय का पर्याप्त पानडन पर्यालोचन हो चुका है अतः इस पर अधिक चर्चा अनावश्यक है ।। १८ ।। १९ वी कारिका में बौद्ध के सामने अन्य आचार्यों के इस प्रतिबन्दी उत्तर का उल्लेख किया गया है कि-विकल्पों से नाशजनकत्व का निरास करने पर भाव-उत्पादजनकत्व का भी उच्छेद हो जायगा--- विकल्पमात्रेण नाशकत्वोच्छेदे जनकत्वस्याप्युच्छेद इति प्रतिवन्या केचित् समादयत इत्याहमूलम्-अन्ये तु जन्यमाश्रित्य सत्स्वभावाद्यपेक्षया । एवमारहेतुत्वं जनकस्यापि सर्वथा ॥१९॥ अन्ये वाचार्याः एवं नाश्यमाश्रित्य नश्वरस्वभावत्यापेक्षावन जन्य-कार्य आश्रित्य सत्स्वभावापेक्षयाः-हेतुत्वेनाभिमतः किं सत्स्वभावजन्यजनकस्वभावः, उत्तासस्वभावजन्यजनकम्बमारः, आहोस्बिदुभयस्त्रभारजन्यजनकस्वभावः, उताहो अनुभयस्वभावजन्यजनकस्वभावः' इति विकल्प चतुष्टयरूपया, जनकस्यापि-उत्पादकस्यापि, न केवलं नाशहेतोरेवेत्यर्थः, अहेतुत्वमाहुः आपादयामासुः ॥ १६ ॥ [ नाशवत् उत्पादजनकत्वोच्छेद आपत्ति-अन्य मत अन्य आचार्यों का यह कहना है कि नाश्य का प्राश्रय लेकार जैसे नश्वरस्वभावत्यादि की अपेक्षा से नाशहेतुप्तया अभिमत पदार्थ में नाशजनकत्व का बौद्ध द्वारा निरास किया जाता है उसी प्रकार कार्य का आश्रय लेकर सत्स्वभावस्वादि अपेक्षा से भावहेतृतथा अभिमत पदार्थ में भी भाव के अनुत्पादकत्व की प्रापत्ति होगी। आशय यह है कि जैसे नाशहेतु का निराल करने के लिये नौद्धों द्वारा ये विकल्प ऊठाये जाते हैं कि-"नाश का हेतु नश्वरस्वभाव का नाशक होता है अथवा अनश्वरस्वभाव का ? प्रथमपक्ष में नाश के स्वतः सम्भव होने से नाशहेतु के व्यापार को मिरर्थकता होती है और दूसरे पक्ष में भी स्वमाय का परिवर्तन प्रशत्रय होने से नाशहेतु के व्यापार की निरर्थकता
SR No.090420
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 5 6
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages231
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size7 MB
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