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स्या० क० टीका एवं हिन्दी विवेचन ]
होती अपितु स्थिर घट में नश्वर स्वभावता का आधान होता है । अत: जैन मत में उक्त व्यभिचार रूप दोष नहीं हो सकता । यदि बौद्ध की ओर से उक्त दोष का परिहार यह कहकर किया जाय कि- मुद्गरावि घटादि के कार्य का जनक होता है घटादि का जनक नहीं होता तो यह परिहार भी जैन मत में समान रूप से सम्भवित है । अतः इस प्रकार अपने मत में प्रयुक्त दूषण का जैसा परिहार बौद्ध मत में होगा उसी प्रकार के दूषण का परिहार सूक्ष्म बुद्धि से विचार करने पर जनमत में भी प्रस्तुत किया जा सकता है । अतः मुङ्गरादि सन्निहित घटादि को नाश का जनक मानने में कोई आपत्ति नहीं हो सकती ॥१०॥
११वीं कारिका में यह बात कही गई है कि जैन मन में जैसे पूर्वोक्त दोष युक्तिसंगत नहीं होते उसी प्रकार अन्य दोष भी युक्तिसंगत नहीं हो सकते -
इत्थं चान्यदप्यत्र दूषणं न युक्तमित्याह
मूलम् - एवं च व्यर्थमेवेह व्यतिरिक्ता दिचिन्तनम् । नाश्यमाश्रित्य नाशस्य क्रियतं यद्विचक्षणः ॥ ११॥
एवं च नाश्यं घटादिकमाश्रित्य नाशस्य विचक्षणैर्व्यतिरिक्ता दिचिन्तनं यत् क्रियते तदपीह = नाश्यविचारे व्यर्थम्, मायतुल्यत्वाद । तथाहि परेषामिदमाकृतं यद् नाशो नाश्यादतिरिच्यते, न वा ? | अन्त्ये भाव एव नाशः, स च सहेतुक एवेति न परेषां साध्यसिद्धिः । आग्रे, अग्न्यादेरवस्तुरूपध्वंसोपगमेऽपि काष्ठादेस्तदवस्थत्त्रात् पुनरुपलब्धिप्रसङ्गः, वस्तुरूपतदुपगमे च काष्ठादेरङ्गारादिकमेव ध्वंसो नापर इत्यत्र किं निबन्धनम् १ | 'तस्मिन् सति तन्निवृत्तिः' इति चेत् ? न, अन्यनिष्टत्यनभ्युपगमेनैतदर्थाभावात् ।
[ नाश्य से नाश के भिन्नाभिन्नत्व की चिन्ता व्यर्थ ।
नाश्वस्तु के विचार के संदर्भ में विद्वानों द्वारा नाश के सम्बन्ध में नाश्य के भेदाभेद का जो चिन्तन किया जाता है वह व्यर्थ है क्योंकि नाश और भाव यानी उत्पत्ति, दोनों में समानता है । अर्थात्, जैसे यह विचार व्यर्थ है कि भाव उत्पत्ति भविता = उत्पाद्य से भिन्न है या अभिन्न है, इसी प्रकार नाश नाश्य से भिन्न है या प्रभिन्न है यह चिन्तन भी व्यर्थ है । व्याख्याकार ने उक्त विचार की व्यर्थता को स्फुट करने के लिये बौद्धों का अभिप्राय प्रस्तुत करते हुए इस प्रकार [ पूर्वपक्ष के ] विचार को प्रस्तुत किया है कि-नाश के सम्बन्ध में दो पक्ष हो सकता है। ( १ ) एक यह कि नाश नाश्य से भिन्न माना जाय अथवा तो ( २ ) नाश नाश्य से अभिन्न माना जाय । यहाँ दूसरे पक्ष में उत्तरभाव ही पूर्वभाव का नाश होगा और वह उत्तरभाव तो सहेतुक होता है अत एव उस पक्ष में नाश सहेतुक होने पर भी जैनाभिमत अपेक्षाभेद से स्थिर नश्वर सहेतुक नाश की सिद्धि नहीं हुई । यदि 'नाश नाश्य से अतिरिक्त होता है इस प्रथम पक्ष को स्वीकार किया जायगा तो इस पक्ष में दो विकल्प होंगे । ( १ ) एक यह कि नाश अवस्तुरूप है। ( २ ) दूसरा यह कि वस्तुरूप है । यवि नाश को वस्तुरूप माना जायगा तो प्रग्नि आदि से काष्ठादि का नाश मानने पर भी उसके साथ काष्ठादि का विरोध नहीं होगा क्योंकि श्रवस्तु भूत नाश से वस्तुभूत काष्ठादि का विरोध होना