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________________ Į स्वा० क० टीका एवं हिन्दी विवेचन ] यच पूर्वमंत्री व सुगतसुतवार्तायामेव नाशहेतोरयोगादि क्षणिकत्वप्रसाधकं “तयाहुः क्षणिकं सर्वम्" [ ४ २] इत्यादिकारिकयोक्तं पूर्वपक्षिणा, तदिदानीमवसर प्राप्ततया परीच्यते |१| बौद्धमत की चर्चा के संदर्भ में चतुर्थ स्तवक की दूसरी कारिका में पूर्वपक्षी ने क्षणिकत्व के free हेतु के अयोग यानी सम्बन्धअसंभव' हेतु का उपन्यास किया है अवसर संगति से अब उसका परीक्षण किया जायगा ॥१॥ ६१ क्षणिकत्व साधनार्थ उक्त हतुओं में प्रथम हेतु है नाशहेतु का अयोग उसकी परीक्षा के लिये दूसरी कारिका में इसका अभिप्राय प्रकट किया गया है--- तत्र प्रथमहेतु परीक्षितुं तदाशयमाविष्करोति - भुलम् - हेतोः स्यान्नश्वरो भावोऽनश्वरो वा विकल्पयत् । नाशहेतोरयोगित्वमुच्यते तन्न युक्तिमत् ॥ २ ॥ 'हेतोः सकाशाद नरो भावः स्यात् ९ अनथरो वा ?' इति विकल्पयत् विकल्पयुगलमुत्थापयत्, नाशहेतोरयोगित्वं चणिकत्वसाधकमुच्यते परेण । आद्ये, स्वतो नश्वरे नाशहेतूनामकिश्चित्करत्वात्, अन्त्येऽपि स्वभावस्य पराकर्त्तुं मशक्यत्वेन तथात्वात् । [ नाशहेतु का अयोग कहने में बौद्ध का आशय ] नाशहेतु की अयोगिता दो विकल्पों द्वारा कही जाती हैं। पहला विकल्प है अपने उत्पादक हेतु से नश्वरभाव का उत्पन्न होना। प्रौर दूसरा विकल्प है उत्पादक हेतु से अनश्वरभाव का उत्पन्न होना । इन दोनों ही विकल्पों में नाशहेतु को अयोगिता सिद्ध होती है। जैसे प्रथम विकल्प में नाश का हेतु इसलिये अकिश्चित्कर होता है कि भाव-स्वभावत तश्वर होने से स्वयं ही नष्ट हो जाता है तो नाशहेतु ने ज्यादा क्या किया ? तथा दूसरे विकल्प में नरश का हेतु इसलिये अकिविकर होता है कि- दूसरे विकल्प के अनुसार भाव अनश्वरस्वभाव होता है अत एव नाशहेतु से भी उसके अनश्वरत्व-स्वभाव का निराकरण नहीं हो सकता । फलतः भाव के नश्वर और अनश्वर उभयविध स्वभाव के पक्ष में नाश हेतु नाश के लिए असमर्थ होता है । श्रत एव भावनाश में हेतु की अपेक्षा न होने से हेतु के बिलम्ब से नाश होने में विलम्ब की सम्भावना न होने के कारण भाव अपनी उत्पत्ति के द्वितीय क्षण में ही नष्ट हो जाता है। इस प्रकार नाश के निर्हेतुकत्व से भाव की क्षणिकता सिद्ध होती है । भाव अनश्वरस्य भाव होता है इस द्वितीय विकल्प में यह प्रश्न ऊठना स्वाभाविक है कि इस विकल्प में नाश हेतु के अकिकिर होने पर भी भाव के स्वभावतः अनश्वर होने से उसका नाश नहीं हो सकता, अतः इस विकल्प में नाश हेतु की अकिचित्करता से भाव को क्षणिकता कैसे सिद्ध होगी ? इसका उत्तर यह है कि मात्र का नाश यतः सर्व सम्मत है अतः उसमें अनश्वरस्यभावता की कल्पना ही नहीं हो सकती । अतः इस विकल्प का प्रदर्शन क्षणिकत्व के साधन में उपयोगी होने से नहीं किया गया है किन्तु नाशहेतु को अकिश्वित्करता बताने के लिये ही किया गया है। विरोधीजिज्ञासा निवृत्त्युत्तरकालिका वश्य वक्तव्यत्वम् = अवसर सगतिः ।
SR No.090420
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 5 6
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages231
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size7 MB
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