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________________ शा. वा. समुच्चय स्तर ४-श्लो० ३३ शब्दस्थलेऽपि शशशृङ्गमुख्यविशेष्यके नास्तित्वप्रकारकशब्दविकल्प एव तत्तदानुपूर्व्याः साम ग्रंकल्पनात् । नहि 'शशशृङ्ग नास्ति' इत्यत्र 'शशशृङ्गाभावोऽस्ति' इति कस्यचिद् व्यवहारः किन्तु 'शशशृङ्गमस्तित्वाभाववत्' इत्येव । न च व्यवहारप्रातिकूल्येन कल्पना युक्तिम. तीति ॥३३॥ (असत् पदार्थ का भी शब्द से ज्ञान) श्रीहर्षने भी इस बात का समर्थन किया है कि-शब्द अत्यन्त प्रसत् अर्थ का, जिसमें उसका कोई सम्बन्ध नहीं है, उसका भी बोधक होता है । अतः निर्गुण ब्रह्म के साथ वेदान्तवाक्यघटक सत्याधि शब्द का कोई सम्बन्ध न होने पर भी शब्वों से उसका बोध हो सकता है। असदर्थ के बोधको अपेक्षा ब्रह्मविषयक बोध में यह अन्तर है कि जहां असदर्यका बोध अप्रमाणिक होता है वहां ब्राह्म विषयक बोध प्रमा होता है क्योंकि उस बोषका कोई बाधक नहीं है प्रत एवं उसका स्वतःप्रामाण्य अभंग रहता है। इस प्रसङ्ग में यह शङ्का होती है कि-"शशशङ्ग प्रादि की योग्यता के शरीर में यदि दोषेतरत्व का निवेश किया जायेगा तो शशशज उपलम्भक दोष से भिन्न भिन्न शशशतके उपलम्भक हेतु को कल्पना करनी पडेगी अतः गौरव है"-किन्तु यह ठीक नहीं है । क्योंकि प्रामाणिक होनेसे यह गौरव दोष रूप नहीं है। यदि इस गौरव का स्वीकार नहीं किया जायेगा तो प्रातीतिक पदार्थों की प्रातीतिकता का उपपादन न हो सकेगा अर्थात् 'उनकी केवल प्रतीति ही होती है-अस्तित्व नहीं होता इस बात का उपपादन नहीं हो सकेगा, क्योंकि प्रातोतिकता के उपपादन के लिए उनके प्रभाव का ग्रहण प्रावश्यक है। यदि उसके प्रभाव का ग्रहण नहीं होगा, तो यह कहना कठिन होगा कि 'उसकी केवल प्रतीति ही होती है, अस्तित्व नहीं होता ।' और जब उसके प्रभाव का प्रहण मानना आवश्यक है तो उसके लिए प्रतियोगो को योग्यता माननी होगी । वह योग्यता वोष घटित मानी जायेगी तो प्रतियोगी का ही उपलम्भ होगा किन्तु अभाव का ग्रहण नहीं होगा। अतः दोष से इतर उसके उपलम्भक कारणों को ही योग्यता मानना होगा और यह तभी सम्मव हो सकता है जब दोष से अतिरिक्त भी उसके उपलम्भ का हेतु माना जाय । इस प्रकार प्रातोतिक पदार्थों के दोष से इतर भी उपलम्भहेतु प्रामाणिक होने से उक्त हेतु की कल्पना का गौरव दोष नहीं माना जा सकता। [धमकीर्ति का प्रत्युत्तर ] इस सम्बन्ध में बौद्ध का यह कहना है कि-योग्यता के शरीर में दोषतरत्व का निवेश करके शशशङ्ग को अनुपलब्धि के काल में शशशङ्ग को योग्यता का उपपादन कर जो शशशङ्गाभाव के ग्रहण को उपपत्ति की गई है वह युक्तिसङ्गत नहीं है । क्योंकि दोष से मिन्न शशक्षका कोई उपलम्भक ही नहीं है। प्रालोक-ममस्कार प्राविको उसका उपलम्मक नहीं माना जा सकता. क्योंकि उसमें माष पदार्थ-सवस्तु को ही उपलम्भकता सिद्ध है । यदि यह कहा जाय कि-'शशशङ्ग नास्ति' इस शब्द से शशशङ्गामाव का ग्रहण हो सकेगा, क्योंकि प्रभाव के शाम्बयोधात्मक शानमें प्रतियोमी की योग्यता पपेक्षित नहीं होती तो यह मी ठोक नहीं हैं ।क्योंकि 'शशशङ्ग नास्ति' इस वाश्य की प्रानुचों में शरान मुख्य विशेष्यक अस्तित्वाभावप्रकारक शासबोधात्मक विकल्प प्रतीति की ही कारणता मानी जाती है। क्योंकि 'शशशङ्ग नास्ति' इस मामय से उत्पन्न बोष का 'शारागाभावोऽस्ति' इन
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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