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________________ ३२ ] [ शा. वा. समुच्चयस्त० ४ श्लो० २१-२२ उपचयमाह मूलम् - ज्ञेयत्ववत्स्वभावऽपि न चायुक्तोऽस्य तद्विषः | तदभावे न तज्ज्ञानं तनिवृत्तेर्गतिः कथम् ॥२१॥ न चास्य = असवस्य तद्विधः सद्भवन लक्षणः स्वभावोऽपि ज्ञेयत्वस्वभाववदयुक्तः, भावस्वभावत्वाभाव एव हि तुच्छत्वम् न तु सर्वथा निःस्वभावत्वम् । अत एव शशविषाणादाचखण्डेऽनादिवासनाप्रभवविकल्प गोचरतया शेयस्वं कृतम् । ज्ञेयत्वमपि नास्त्येव तत्र ' इत्यवाह तदभावे ज्ञेयत्वाभावे न तज्ज्ञानं नासत्वज्ञानम् । तथा च तनिवृत्तेः सवनिवृत्तेः, गतिः परिछेदः कथम् ? ॥२१॥ पराभिप्रायमाह - मूलं तत्तद्विधस्वभावं यत्प्रत्यक्षेण तथैव हि । गृह्यते नद्गतिस्तेन नैतत्क्वचिदनिश्चयात् ||२२|| तत् = मखानुविद्धं वस्तु तद्विस्वभावं निवृत्तिरूपधर्मकम् यद्यस्मात् तम्मात् प्रत्यक्षेण= तथाभृतयस्तुग्राहिणा निर्विकल्पेन, तथैव हिस्वधर्मवदेव, गृश्यते=परिच्छिद्यते । $ [ सत्त्व में सद्भवनस्वभावता और ज्ञेयत्थ की सिद्धि] २१ व कारिका में सत्व में श्रापादित सद्भवनस्वभावता की पुष्टि की गई है। कारिका का श्रर्थः श्रसत्त्व का जेसे ज्ञेयस्यास्वभाव युक्तिविरुद्ध नहीं है उसी प्रकार उसकी सद्भवन स्वभावता भी युक्तिविरुद्ध नहीं है । यदि यह कहा जाय कि असत्त्व की सद्भवनस्वभावता के समर्थन में शेयत्व को दृष्टान्त रूप से प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। क्योंकि ज्ञेयत्व को प्रसव का स्वभाव मानने पर तुच्छता प्रतुपपन होगी" तो यह ठीक नहीं है क्योंकि तुच्छता सर्वेया नि:स्वभावत्वरूप नहीं है अपि तु साथ स्वमावत्व का प्रभावरूप है। अर्थात् तुच्छ होने के लिए यह आवश्यक नहीं कि वह सर्वथा स्वभावशून्य हो । feng यह आवश्यक है कि नाव के प्रसाधारण स्वभाव से शून्य हो । 'इसलिए शशसोग इस प्रखण्ड रुप से भासमान को, श्रनावि वासनाजन्य विकल्पात्मक ज्ञानका विषय होने से बौद्धाविकों ने मी माना है । यदि यह कहा जाय कि "असत्त्व में शेयत्व भी नहीं होता, अतः उसमें सद्भवनरूप भावान्तर ज्ञेय को सिद्ध करने के लिए ज्ञेयत्व काष्टांत रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता" तो यह ठीक नहीं है। क्योंकि यदि उसमें ज्ञेयत्व का प्रभाव होगा तो उसका ज्ञान न होगा। फलत: उसी स्थिति में सत्यनिवृत्ति का परिच्छेद कैसे हो सकेगा ? ॥२१॥ * विकरूपात्मक ज्ञानः-ओ ज्ञान शब्दज्ञान से उत्पन्न हो और जिसका विषयभूत पदार्थ वास्तविक से उत्पा न हो उस ज्ञान को विकल्पात्मकज्ञान कहते हैं । शशसींग का ज्ञान 'शशशु' इस शब्द होता है और उसका विषय 'शशशुग' वास्तविक नहीं है। अतः 'शशसींग' का ज्ञान विकल्पात्मकशाच कहा जाता है, उस ज्ञान का विषय होने से 'शशशृङ्ग' शेम कहा जाता है ।
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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