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________________ स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [ ३१ कार्यदर्शनेन तस्कुर्वरूपानुमानमपि निराधाधमेव, तथाविधक्षणकुपक्षणानुमानेऽप्यस्यैव बीजत्वात् , कार्यसामान्ये सत्कुर्वद्रूपत्वेन तु न हेनता. मानामावान् , गौरवाच्च । यदि च 'अभावस्य भावीकरणमेव तद्वयापारः अन्यथानुपयोगादिति' संप्रदाया, तदा कार्यदर्शनवलाद् भावम्याभावीकरणपनि न्यापासावारीका व्यमिति । अधिकमग्रे । तथा, स्वनिसि= स्वात्मनिवृत्तिः स्वभावा-धर्मः, अस्य असत्यस्य भावस्येब, हेतुसामात् । यत एवं ततो न किं युक्त्या समं स्वहेनोरेव जातलादिकल्पनम् ॥२०॥ क्षण में होता है वह उसका फल-काय होता है और जो जिसके अव्यवहित पूर्वक्षरण में नियत होता है वह उसका जनक हेतु होता है। यदि यह कहा जाय कि- 'भाव में असत्त्वका कुर्वदरूपत्व प्रसिद्ध है। अतः उसे असत्व का कारण माना नहीं जाता, क्योंकि बौद्ध मत में कार्यकर्वपत्वेन ही कारगता होती है"-तो यह ठीक नहीं, क्योंकि भाव के अनंतर असत्व रूप कार्य के कुवंद्र रत्व का अनुमान निर्वाध रूप से सम्पन्न हो सकता है। क्योंकि जहाँ कहीं भी प्रनन्तरभावी क्षण के प्रति पूर्व मावो कुर्वद्रूप क्षरण का अनुमान होता है वहां सर्वत्र इस अनुमान में नियतानन्तरभावित्व ही बीज होता है । यदि यह कहा जाय कि-'कार्यसामान्य के प्रति कारण को सदनुकुल कुर्वद्रूपत्व रूप से ही कारणता होतो है । अतः भाव असत्त्व का कारण नहीं हो सकता क्योंकि सदनुकुलकुर्व पकारण सद्रूप कार्य को ही उत्पन्न कर सकता है'-तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि उसमें कोई प्रमाण नहीं है, अपितु कारणतावच्छेदक कोटि में सदनुकुलकुर्व पत्व के प्रवेश में गौरव भी है। (भाव का प्रभाव में परिवर्तन को पूर्ण शक्यता) यति सह शहा की जाय कि-"माव प्रसत्वका कारण नहीं हो सकता, क्योंकि अभावका भाव में परिवर्तन करना कारण का व्यापार होता है अन्यथा कारण को कोई उप सिद्ध न हो सकेगी, यही सम्प्रदाय की मान्यता है। प्रतः भावको प्रसत्त्वका कारण नहीं माना जा सकता। क्योंकि मायरूप कारण से प्रसत्त्व का भावीकरण नहीं होता यानी प्रसत्त्व की भावात्मकता का सम्पावन नहीं होता"-तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि जब भाव के अव्यवहित उत्तर काल में प्रसत्वरूप कार्य का वर्शन होता है तो भाय का प्रभाव में परिवर्तन करना भो हेतु का व्यापार मानना प्रावश्यक होगा। प्रतः भावको प्रसत्त्व का कारण मानने में कोई बाधा नहीं है। फलतः, जब प्रसत्व भी सकारणक हुमा तो उसके बारे में यह कल्पना की जा सकती है कि-प्रसस्व प्रपने कारण से सजवन स्वभाव से सम्पन्न होकर ही उत्पन्न होता है । इस विषय में और बात मागे ज्ञात हो सकेगी। कारिका के उत्तराध में यह बताया गया है कि उक्त रीति से असत्त्व में सकारणकाव सिद्ध हो जाने पर यह भो कल्पना की जा सकती है कि जैसे भाव अपने कारण से, निवृत्त होने के स्वभाव से सम्पन्न ही उत्पन्न होता है उसी प्रकार असत्त्व भी अपने प्रतियोगीभूत भावात्मक कारण से, निवृत्ति स्वमाव से सम्पन्न होता है। इस प्रकार तुच्छ की निवृत्ति सरलतया ही सिद्ध हो सकती है। प्रस: पूर्व कारिका में भाव के समान असत्त्व में भी अपने कारण से ही उत्पत्ति आदि कल्पना में जो साम्य बताया गया है वह युक्तिसङ्गत क्यों नहीं हो सकता! ॥२०॥
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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