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________________ १] [ शा. वा० समुच्चय-स्त०४ श्लो०९ सन्तानापेक्षया भृत--वर्तमान--भविष्यन्क्षणप्रवाहापेक्षया अस्माकं अखिला ऐहिक आमुष्मिकश्च व्यवहारः मतः इष्टः । स च सन्तानः एक एव । तस्मिश्च सति कस्माद् न युज्यते स्मृत्यादिः, ऐहिकतयोपयत्तेःः ॥८॥ आमुनिकमधिकृत्याह मूलम्-यस्मिन्नेव तु संताने आहिता कर्मवासना । ___ फलं तत्रैव सन्धत्ते कर्पासे रक्तता यथा ॥१॥ यस्मिन्नेव सन्ताने अणप्रवाहे, तुःआधानयोग्यतां विशेषयति, कर्मवासना आहिताकर्मणा जनिता, फलं-शुभाऽशुभादिकम् , तत्रैव संधत्तेजनयति । किंवत् इत्याह यथा कसे लाक्षारसाद्याहिता रक्तता कर्पास एब स्वफलं स्वीपरक्तयुद्धयादिकं जनयति ॥९॥ यह हेतु-हेतुमजाव का सन्तानपक्ष है । सामग्रोपक्ष तब होता है जब किसी एक सन्तान से विजातीय सन्तान की उत्पत्ति होती है जैसे बीज से अङकुर की उत्पत्ति के लिये अकेला बोज पर्याप्त नहीं होता किन्तु उसमें उपजाउ भूमि आदि का सन्निधान अपेक्षित होता है। हेतु-हेतमद्भाव का यह पक्ष सामग्री पक्ष कहा जाता है। इस सामग्री पक्ष की मालोचना ६६ वौं कारिका से प्रारब्ध होगी। प्रस्तुत कारिका ८ से सन्तान पक्ष को दृष्टि से पूर्वोक्त आक्षेपों का समाधान प्रारंभ किया जा रहा है-कारिका का अर्थ इस प्रकार है (सन्तान पक्ष में हेतु-हेतुपद्भाव उपपत्ति) बौद्धों का कथन यह है कि प्रत्येक वस्तु यद्यपि क्षणिक है किन्तु उसका प्रवाह भूत वर्तमान और भविष्य तोनों काल में चलता रहता है जिसे 'सन्तान' संज्ञा से अभिहित किया जाता है। इस सन्तान से सम्बद्ध व्यक्तियों के अनेक होने पर भी सोनों काल में यह सन्तान एक होता है । अतः उसके द्वारा ऐहिक अर्थात् पूर्वानुभूत का कालान्तर में स्मरण, पूर्वानुभूत को उत्तरकाल में प्रत्यमिजा, ज्ञात और इच्छित को प्राप्त करने को प्रवृत्ति प्रादि समस्त ऐहिक व्यवहार और पूर्व जन्म में किये गये शुमाशुभ कर्मों का उत्तर जन्म म उपभोग रूप प्राष्मिक व्यवहार की उपपत्ति हो सकती है । प्रतः सन्तानी-सन्तानान्तर्गत व्यक्तित्रों के अनेक होने पर भी सन्तान के तीनों काल में अनुवर्तमान होने के कारण स्मरणादि की उपपत्ति क्यों नहीं हो सकती? जब उक्त प्रकार से सन्तान द्वारा उस सम्पूर्ण व्यवहारों की उपपत्ति हो सकती है तब उनके अनुरोध से वस्तु में स्थिरता (प्रक्षणिकता) की कल्पना का प्रयास अनावश्यक है ॥८॥ (क्षणिकरवपक्ष में पारलौकिक फल को उपपत्ति) नवों कारिका में भावमात्र के क्षणिकत्व पक्ष में भी कर्म फल के प्रामुष्मिक उपभोग की उपपत्ति की गई है जो इस प्रकार है जिस सन्तान में क्षणात्मक वस्तु के प्रवाह में कर्म से वासना की उत्पत्ति होती है वह वासना उस सन्तान में ही कर्मफल को उत्पन्न करती है। यह बात ठीक उसी प्रकार उपपन्न होती है जैसे कापस के बीज में लाक्षा के रसादि से पंदा को गई रक्तता उस बीज से उगत और विकसित
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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