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[शा. या. समुच्चय स्त०-४ श्लोक ५-६
स्मरणाऽसंभवापपादयति
मलम्-अनुभूतार्थविषयं स्मरणं लौकिकं यतः ।
कालान्तरे तथाऽनित्ये मुख्यमेतन्न युज्यते ॥५॥ अनुभूतार्थविषयंत्रातार्थगोचरम् , लौकिकम् आगोपादिमिद्धम् , यतः यस्मात् , कालान्तरे अनुभश्व्यवहितोत्तरकाले. तथा अनिनियतरूपेण, अनित्य-निग्न्वयनश्वरेऽनुभवितरि, मुख्यम् अभ्रान्तमेव, एतत्-स्वसंवेदनसिद्धं स्मरणम् नोपपद्यते-अन्येनाऽनुभवेऽन्य. स्य स्मरणाऽयोगात , 'योऽहमन्वभवं सोऽहं स्मरामि' इत्युल्लेखानुपपत्तेश्च ॥५॥ प्रत्यभिज्ञापि न युज्यते इत्याहमूलम्-सोऽन्तेवासी गुरुः सोऽयं प्रत्यभिज्ञाप्यसंगता ।
दृष्टकौतुकयुनेगः' प्रवृत्तिः प्राप्तिरेव वा ॥६॥
[ संदर्भ:--प्रतिपक्ष में बाधक प्रदर्शन और उसकी अभिप्रेत युक्तियों का खण्डन-दो प्रकार से प्रतिपक्ष का निराकरण करने में यहाँ ४ थे और पांचवे स्तबक में क्रमशः सौत्रान्तिक और योगाचार मत में बाधक युक्तिनों का ही निरूपण होगा। छ? स्तबक में क्षणिकवाद की साधक नाशहेतोरयोगादि' युक्तियों का खण्डन प्रस्तुत होग]
[पूर्वानुभूत का स्मरण क्षणिकत्व पक्ष में बाधक ] पांचवीं कारिका में पूर्वकारिका में कथित स्मरणानुपपत्ति का उपपादन किया गया है, कारिका का अर्थ इस प्रकार है
पूर्वकाल में अनुभूत वस्तु का कालान्तर में स्मरण होता है यह बात सर्वजनसिद्ध है, इस में प्रशिक्षित गोपाल से लेकर महान शाखज्ञ तक किसी का भी वैमत्य नहीं है किन्तु भावमात्र को क्षणिक मानने पर यह स्मरण नहीं हो सकता, क्योंकि इस मत में माव का पूर्वकाल में अनुभव करने वाला व्यक्ति क्षणिक होने के नाते कालान्तर में नहीं रह सकता, क्योंकि क्षणिक का अर्थ ही है निरन्वय विनष्ट होना अर्थात् वस्तु का ऐसा नाश होना जिस से किसी भी रूप में कालान्तर में उस का मन्वय-सम्बन्ध न रह सके । और जब कालान्तर में पूर्वानुमव कर्ता न रहेगा तो स्मरण न हो सकेगा, क्योंकि जिसे पूर्वानुभव है वह स्मरणकाल में है नहीं और जो स्मरणकाल में है उस को पूर्वानुभव नहीं है और अन्य के अनुभव से अन्य को स्मरण नहीं हो सकता क्योंकि स्मरण और अनुभव में एकात्मनिष्ठतया कार्यकारणभाव है। इसीलिए अन्य के अनुभव से अन्य को स्मरण नहीं होगा। और यदि अन्य के अनुभव से अन्य को स्मरण माना जायगा तो 'योऽहं अन्वभवम् सोऽहं स्मरामि-पूर्वकाल में मैने ही अनुभव किया था और पाज मैं ही स्मरण कर रहा हूँ इस प्रकार अनुभव और स्मरण का एकनिष्ठसया उल्लेख नहीं हो सकेगा॥५॥
(१) 'कमुस' इति पाठ भारतः, दृष्टकौतुकडोकसिद्धमिति च व्याख्यातं टीकायाम् ।