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________________ २२६] [ शा. पा. समुघय स्व-४ श्लोक-१३६ व्यवहाराश्रयणात्तु प्रकृतप्रयोगोऽनुपपन्न एव, रूपपदादेकरूपेणोपस्थितियोग्यस्यापि रूपस्य भिन्नाश्रयवाचकपदसमभिव्याहारेण भेदविवक्षावश्यकत्वात , उभयत्र मिलितवृत्तित्वान्वयाऽयोगात् । अत एव न तन्मते 'पश्चानां प्रदेशः' किन्तु 'पञ्चविधः एव' इति व्युत्पादितं नयरहस्ये । अत एव च 'स्थाद् घट-पटयोन रूपं, स्याद् घट पटयो रूपम्' इति वाक्यात् तात्पयज्ञस्य क्रमिकविधि-नियेधान्वयानुभवः सुघटः, भिननयजन्यान्बयोधे भिननयजन्यबोधधियोऽप्रतिबन्धकत्वात् ; प्रत्युत महावाक्यार्थयोघेऽवान्तरवाक्यार्थज्ञानस्य हेतुत्वेनाऽनुगुणत्वात् । पर रूप शब्द के रूपसामान्य रूप अर्थ में घट-पटोभयवृत्तित्व का अन्वय हो सकता है। किन्तु यदि धस्तु को सामान्यविशेषोभयात्मक माने तो उमा मन में बस जाना में चोभयत्तित्व का अन्वय नहीं हो सकता । क्योंकि रूप शब्द से रूपत्व धर्म द्वारा रूपति शेष ही उपस्थित होगा। कोई भी रूपविशेष घटपटोमयत्ति नहीं होता। (घटपट उभय में वृत्ति साधारण रूप का प्रभाव) व्याख्याकार ने इस तथ्य को 'उद्भतक से 'अन्वयायोगात् वाक्यपर्यन्त से प्रतिपादित किया है। उन्हों ने घट-पट को उद्भूत एक द्वित्व द्वारा कोडोकरण होने से एकतापन्न कहा है। द्वित्व द्वारा कोडीकरण का अर्थ है द्वित्वरूप से भासित होना और एकतापन्न का अर्थ है एकप्रकारता निरूपिल विशेष्यता युक्त होना अर्थात् 'घटपटयो रूपम्' इस वाक्यजन्य बोध में द्वित्वनिष्ठ एकप्रकारता निरूपित विशेष्यता घट-पट उमय में होती है। प्रतः नित्वनिष्ठ प्रकारता निरूपित विशेष्यतापन घट पट वत्तित्व उसी में हो सकता है जो घट-पटद्वयवृत्ति हो। कोई भी रूप द्वयवृत्ति नहीं होता, प्रतः 'घट-पटयो रूपम्' इस स्थल में नैयायिकमत में प्रवयानुपपत्ति ध्रुव है । यदि यह कहा जाय कि-'घर और पट का रूप वस्तुत दो है अत: 'घट-पटयो रूपम्' इस स्थल में उन दोनों का हो मेव विवक्षित है। प्रात् रूप शब्द से घट रूप और पटरूप दोनों पार्थक्येन विवक्षित है प्रतः एककरूप में द्वित्वरूपेण भासमान घटपट में से प्रत्येक का प्रस्त्रय हो सकता है । अतः उक्त स्थल में न्यायमत में भी प्रावयानुपपत्ति नहीं हैकिन्तु यह कहना सम्मव नहीं है क्योंकि द्वित्वरूप से मासमान प्राधार का पार्थक्येन विभिन्न प्राधेय में अन्यय उसी स्थल में होता है जहां प्राधेयगत द्वित्व के निरूपक धर्मद्वय से विशिष्ट प्रर्थ के बाचकपन का सममियाहार होता हो। जैसे 'घटपटयोर्धटपटरूपे इस स्थल में द्वित्वरूप से भासमान घटपट के वत्तित्व का पार्यक्पेन प्रन्यय घटपटरूप में होता है क्योंकि यहाँ घरपटात्मक प्राधार का प्राधेय घटपट के रूप में जो द्वित्व विद्यमान है उसके निरूपक घटरूपत्व और पटरूपरव इस धर्म द्वय से विशिष्ट घटरूप पोर पट रूप के वाचक घटपटरूप शब्द का सममिव्याहार है । (व्यवहारनय से उक्त प्रयोग का अनौचित्य) ज्यवहारनय कामाश्रय होने पर तो 'घटपटयो रूपम्' यह प्रयोग उपपन्न नहीं हो सकता । यह भी नहीं कहा जा सकता कि- घटपटयो रूपम्' यहां रूप पब से रूपत्वात्मक एकरूपेरण उपस्थित रूप में सामान्य रूप से घट-पट उभयत्तिश्व का अन्वय हो सकता है क्योंकि भिन्नाश्रयों के वाचक पर का समभिव्याहार होने पर सामान्यरूप से उपस्थित प्रर्य में भी मेक को विषक्षा प्रावश्यक होती है।
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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