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________________ २०८ ] [ शा वा समुरुचय स्त८ ४ श्लोक ११० । रजनधीस्थलेऽपि सन्चात् सत्यरजतधीस्थले तत्तल्यतालाभेनार्थसंशयात् । 'एकत्राऽग्जते रजतत्यारोपः, अन्यत्र तु रजते इति न तसौल्यमिति चेत् ? न, रजते रजतत्वारोपः इति वदत एवं व्यायाल, विकापाय विशेषम मात्रविषय यलक्षणाऽसंस्पशाग्युपगमाच्च । 'एकत्र स्वजनकाऽजनकरजतग्रहाभेदग्रहात् सत्यामन्यरजतीविशेष' इति चेत् ? न, बाधेऽपि प्रधृत्यौपयिकरूपान्याघाताद् गृहीतरजतग्रहाभेदग्रहन्वेनैव रजतार्थिप्रवृत्ति हेतुत्वात । अथाऽगृहीतरजतग्रह मेदं दर्शनमेव रजतार्थिप्रवृत्तिहेतुः, स्वतो निश्चितप्रामाण्यकत्वात , अमत्यजतधीम्थले च शुक्तिदर्शने रजतग्रह भेदग्रहाद् न प्रवृत्तिः, केवलनिर्विकल्पकादप्रवृत्तेश्च त्य ग्राहो विकल्प से अनित्यत्व के प्रसंदिग्ध निश्चय प्रभाव रूप दोष नहीं हो सकता क्योंकि तदभाववति तदवगाहित्व रूप अप्रामाण्य झान से अनास्कन्दित विकल्प हो विषय का निनायक होता है जो प्रलोकविषयत्वरूप प्रप्रामाण्य ज्ञान होने पर मो सुलभ है [ सत्य रजतज्ञान भी असत्य होने का संदेह ] कितु यह ठोक नहीं है क्योंकि--बौद्ध मत्त में जहां रजतज्ञान सत्य माना जाता है वहां भी रजतत्य का प्रारोप होता है क्योंकि रजसत्वादि धर्म बौद्धमत में अलीक है, और जहाँ प्रसत्य रजतज्ञान होना है वहाँ भी रजसत्व का मारोप होता है। इसलिये सत्यरजतज्ञान में तुल्यताजान से प्रसस्य रजतविषयकत्व का संदेह हो जायगा । इस प्रकार जब ज्ञान प्रसद्विषयक माना जायगा तो अनित्यत्वयाती विकरूप में भी ज्ञानात्मना प्रसन्नाही ज्ञान का साम्य होने से प्रसद्विषयकश्व का संदेह होगा। प्रतः उससे अनित्यत्व का निश्चय नहीं हो सकेगा। यदि सत्य-असत्य रजतज्ञान के सम्बन्ध में यह कहा जाय कि-असत्यरजतज्ञान स्थल में प्ररजत में रजतत्व का प्रारोप होता है और सत्यरजतज्ञानस्थल में रजत में रजतत्व का आरोप होता है अतः दोनों ज्ञानों में तुल्यता नहीं हो सकती'. तो यह ठोक नहीं, क्योंकि रजत में रजतरब का प्रारोप बताने में वचन व्याघात है। क्योंकि रजतत्व का प्रारोप न होने पर ही रजत को सत्य कहा जायगा । यह भो ख्याल रहे कि बोन मत में विकल्प को विशेषणमात्र विषयक माना गया है। इसलिये स्वलक्षण सत्वरजलग्राही विकल्प में प्रारोपित रजतत्व का सम्बन्ध भी नहीं हो सकता। [ असन् ज्ञान में भी प्रवर्तकज्ञानाभेवग्रह मान्य ] यदि यह कहा जाय कि-'सत्य रजत का विकल्प सत्य रजत के दर्शन से उत्पन्न होता है प्रत एय उस में कारणीभूतज्ञान का प्रभेदग्रह होता है और असत्य रजतमान रजतविषयकदर्शन से उत्पन्न नहीं होता किन्तु अरजत के दर्शन से उत्पन्न होता है प्रतः उसमें रजतग्रह का प्रभेदग्रह नहीं होता है । प्रतः दोनों में तुल्यता नहीं हैं तो यह कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि बायस्थल में प्रसत्यरजतमानस्थल में भो रजतार्यो को प्रवृत्ति होती ही है। प्रत एव असत् रजतज्ञान में भी प्रवृत्त्योपयिक रूप का अध्याघात अस्तित्व मानना होगा और वह रूप यही है कि प्रवर्तक ज्ञान में रजतग्रह के प्रमेद का ग्रह होना । प्रतः रजत ग्रह के अभेद का ग्रह असत्य रजतज्ञान में मो प्रावश्यक है क्योंकि जिस ग्रह में रजतप्रह का अभेद गृहीत हो यह ज्ञान ही रजतार्थों की प्रवृत्ति का हेतु होता है प्रतः असत् रजत ज्ञान में. रजतप के प्रभेव का ज्ञान न मानने पर उस से प्रवृत्ति न हो सकेगी।
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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