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________________ शा० क० टीका-हिन्दी विवेचना | [ किं सहकारित्वम् ? - अतिशयाऽऽधायकत्वम्, एककार्यप्रतिनियतत्वं वा ? आग्रे, अतिशयाधानेनैव कारको पयः, अतिशयस्य भेदे च सहकार्यनुपकारः, अभेदे च चलाद् भिन्नस्वभावत्वम् । द्वितीये, साहित्येऽपि पररूपेणाऽहेतुत्वादकारकावस्थात्यागात् कार्यानुत्पत्तिरेव । ' इतर हेतु संनिधान एव कार्य जनयतीति हेतोः स्वभावः' इति चेत् १ तहूयु त्पश्यनन्तरमेव स्वभावानुप्रविष्टवादितरहेतून मेलयेदिति । [स्थाभित्र में क्रिया का असम्भव ] (२) द्वितीय हेतु से भाव के क्षणिकत्व की सिद्धि का उपपादन करते । हुए व्याख्याकार ने कहा हैअर्थक्रियासमर्थत्व रूप द्वितीय हेतु किसी स्थायिभावों में नहीं हो सकता, श्रतः भाव को क्षणिक मानना आवश्यक है ताकि उस भावो में अर्थक्रियासमर्थत्व रह सके । प्रयंक्रियासमर्थत्व स्थायि भाव में नहीं रह सकता' इस तथ्य को व्याख्याकार ने इस प्रश्न के प्राधार पर प्रतिष्ठित किया है कि स्थायिभाव यदि कार्य का जनक होगा तो क्रम से होगा प्रथवा प्रक्रम से होगा ? इसमें दूसरा पक्ष मान्य नहीं हो सकता क्योंकि यदि भाव से कार्यों की उत्पत्ति प्रक्रम से होगी तो उसके समस्त कार्य एक ही क्षरण में हो जायेंगे । श्रतः दूसरे क्षरण उसका कोई कार्य शेष न रहने से उसका अस्तित्व प्रामाणिक हो जायगा, क्योंकि अर्थक्रियाकारित्व हो अस्तित्व है एवं अस्तित्व का साक्षी है। प्रथम पक्ष भी स्वीकार्य नहीं हो सकता क्योंकि उस पक्ष में इस प्रश्न का समाधान नहीं हो पाता कि भाव यदि बाद में उत्पन्न होने वाले कार्यों का जनक होता है तो उन कार्यों को पहले ही क्यों उत्पन्न नहीं कर देता ? क्योंकि बाद में भी उसे हो उन कार्यों की उत्पन्न करना है ! तो वह जब पहले विद्यमान है तब पहले ही उन कार्यों को उत्पन्न करने में कोई बाधा तो है नहीं । अतः पहले ही उस समय उन सभी कार्यों को उत्पन्न कर देना चाहिये । श्रतः भाव को क्रम से कार्यों का उत्पादक मानना प्रत्यन्त संकटपूर्ण है । 1 यदि यह कहा जाय कि 'भाव अकेला कार्य का जनक नहीं होता, क्योकि कोई भी कार्य किसी एक हो कारण से उत्पन्न नहीं होता इसलिये भाव को अपना कार्य उत्पन्न करने के लिये उस कार्य के श्रन्य कारणों के भी सहयोग की अपेक्षा होती है इन सहयोगी कारणों को सहकारी कारण कहा जाता है । श्रतः बाद में होने वाले कार्यों के सहकारी कारणों का पूर्व में सन्निधान न होने से पूर्व ही उनकी उत्पत्ति की प्रापत्ति नहीं हो सकती। किन्तु भाव को जब जिस कार्य के सहकारी कारणों का सन्निधान प्राप्त होता है तब ही भाव से उस कार्य की उत्पत्ति होती है । अत एव भाव क्रम से अपने कार्यों को उत्पन्न करता है इस पक्ष के स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं हो सकती'तो यह कथन भी ठीक नहीं है क्योंकि इस कथन का श्राधार है म य द्वारा कार्य की उत्पत्ति में सहकारी की अपेक्षा । किन्तु यह बात सहकारित्व का निर्वाचन न हो सकने से स्वीकार नहीं की जा सकती। -जैसे सहकारित्व के सम्बन्ध में दो विकल्प हो सकते हैं, पहला यह है कि सहकारित्व प्रतिशयाधायerrer है। अर्थात् भाव का सहकारी वह होता है जिससे भाव में कोई अतिशय उत्कर्ष उत्पन्न हो, जिसके बल से भाव कार्य को उत्पन्न कर सके । और दूसरा विकल्प है सहकारित्व 'एक कार्यप्रतिनियतत्व' रूप है श्रर्या सत्तद् कार्य के उत्पादन के समय जो भाव के साथ नियम से अवश्य उपस्थित हो वह तत्तद्कार्य को उत्पन्न करने में भाव का सहकारी होता है ।
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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