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________________ स्या का टीका-हिन्दी विवेचना ] [ १७३ (विभुपदार्थ के विशेष गुणों में क्षणिकता के नियम का विसंवाद ) __यदि यह कहा जाय कि-"उत्तरक्षणवत्ति विभु का विशेषगुण अपने पूर्ववत्ति विभु के योग्य. विशेष गुण का नाशक होता है-यह नियम है इसलिये कोई अध्यवसाय बीर्घकाल तक नहीं रह सकता, क्योंकि, जो भी उस के उत्तरक्षण में विभुविशेषगुण उत्पन्न होगा उससे उसका नाश हो जायगा और जाग्रत अवस्था में प्रति क्षरण कोई न कोई ज्ञान उत्पन्न होता ही रहता है"-किन्त यह ठीक नहीं है क्योंकि, जैसे सुषुप्ति के अव्यवहित प्राककाल में उत्पन्न होनेवाला ज्ञान प्रावि क्षणिक होता है, उसके अव्यवहित द्वितीयक्षण में ही उस का नाश हो जाता है, क्योंकि सुषुप्ति हो जाने पर त्वङ्मन:संयोग न रहने से प्रात्मा में किसी विशेष गुण की उत्पत्ति का सम्भव न होने से उसका नाश उत्तरकालिक विशेषगुण से नहीं होता अपितु पूर्ववर्तीगुण से या स्वयं उसी से उस का नाश होता है-उसी प्रकार समी योग्य विभु विशेषगुण क्षणिक हो जायेंगे । अर्थात् जाने द्वितीयमाण में भी ना हो जगांगे क्योंकि भो स्व शब्द से गृहोत हो सकता है। प्रत एव स्वशब्द से द्वितीयक्षण में होने वाले विशेषगुण को ग्रहण करने पर स्व का पूर्ववत्ति होने से उन में नाश्यता मो हो जायगी। इसी प्रकार प्रत्येक योग्य विभु विशेषगुण में स्वनाश्यता और स्वनाशकता उमय को प्रसक्ति होने से उसका द्वितोयक्षण में नाश हो जायगा । दूसरी बात यह है कि 'सत्व' एक अनुगत धर्म न होकर प्रतिव्यक्ति विश्रान्त हो माना जाता है क्योंकि उसे अनुगत मानने पर सामान्यरूप से स्वाध्यवहितोत्तरत्व प्रथवा स्वाव्यवहितपूर्वत्व को अप्रसिद्धि हो जाती है, क्योंकि स्वाव्यवहितोस रत्व का अर्थ होता है स्वाधिकरणक्षणध्वंसाधिकरणक्षणध्वंसानधिकरणत्वे सति स्वाधिकरणक्षणध्वंसाधिकरणत्व, अर्थात् स्व के अधिकरणभूत क्षण के ध्वंस का प्रधिकरणभूत जो क्षण, उस क्षण के ध्वंस का अनधिकरण होते हुए जो स्वाधिकरणक्षणध्वंस का प्रधिकरण होता है उसे स्वाव्यवहितोत्तर कहा जाता है। इसीप्रकार स्वाव्यवहितपूर्वत्तित्व का प्रथ होता है स्वाधिकरणक्षणप्रागभावाधिकरणक्षणप्रागभावनाधिकरणत्वे सति स्थाधिकरणक्षणध्वंसानधिकरणत्व, प्रति स्वाधिकरणक्षण के प्रागभाव का प्रधिकरण जो क्षण, उस क्षण के प्रागभाव का अनधिकरण जो क्षण उस क्षण के प्राग माय का अनाधिकरण होते हुये जो स्वाधिकरणक्षणध्वंस का अनधिकरण हो। यदि स्वशब्दार्थ अनुगत माना जायगा तो स्वाव्यवहितोत्तरत्व के शरीर में स्वाधिकरणक्षणध्वंसाधिकरणक्षणध्वंसानधिकरणत्व को अप्रसिद्धि हो जायगी। क्योंकि प्रत्येकक्षण के पूर्व का तृतीयक्षण भी किसी न किसी स्व का प्रधिकरणक्षण होगा, उस के ध्वंस का अधिकरण पूर्ववत्ति द्वितीयक्षण होगा और उस के ध्वंस का यह क्षण अधिकरण हो हो जायगा जिस में स्वाव्यवहितोत्तररव स्थापित करना है। इसी प्रकार स्वाथ्यवहित पूर्वत्व के शरीर में दोनो ही दल प्रसिद्ध हो जायेंगे क्योंकि जिस क्षण में स्वाव्यवहित पूर्वत्व स्थापित करना है उस के पूर्व में उत्पन्न होनेवाला पदार्थ भी स्वपद से पकडा जा सकता है इसलिये स्वाधिकरण क्षण शब्द से स्वाव्यवहित पूर्वश्वेनाभिमत क्षरण के पूर्व का भी क्षरण हो जायगा और वह उस के ध्वंस का प्रधिकरण हो होगा । इसी प्रकार स्वशब्द से स्वाऽव्यवहित पूर्वत्वेन अमिमत क्षण के उत्तर तृतीयक्षण में उत्पन्न होनेवाला पदार्थ स्वपर से पकड़ा जा सकता है, उस का प्रधिकरण उत्तरवों ततोयक्षण होगा । और उसके प्रागभाव का वह भरण अधिकरण ही होगा जिस में स्वाध्यवाहित पूर्वस्व अभिमत है । इस प्रकार स्व पदार्थ को अनुगत मानने पर स्वास्यवहित उत्तरत्व और स्वाव्यवहित पूर्वत्व को मप्रसिद्धि हो जायगी। प्रतः स्वत्व को तत्तद्वयक्तित्वरूप मानना पडेगा जिस से कि स्वाव्यवहित उत्तरत्व और स्वाव्यवहित पूर्वत्व तत्तयक्ति के स्वाव्यवहित उत्तरत्व और स्वाव्यवहित पूर्वत्व के रूप में प्रसिद्ध बन सके। इस प्रकार जब स्वस्व विविध हुमा तो पूर्ववर्ती योग्य विभु विशेषगुण
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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