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________________ स्या का टीका-हिन्दीविवेचना ] [ १६१ न तयोस्तुल्यतैकस्य यस्मात्कारणकारणम् । ओघारातुविषयं न त्वेवमितरस्य तु ॥१००|| न तयोः गृहिताविनाभावनालिकरद्वीपयासिसमनन्तरयोः तुल्यता, यस्मादेकस्य गृहीताविनाभावस्य कारणकारणं धूमज्ञानोपादानम् ओघात सामान्यतः, तथाविकल्पानुपरागणेति यावत् , तहेतुविषयं गृह्यमाणधृमहेत्वग्निविषयम् , न तु एवम्-उक्तवत् , इतरस्य तुम्नालिकेरद्वीपवासिनस्तु, तेन सदा तदग्रहणात् ॥१००। अत्रोत्तरम् यः केवलानलग्राहिज्ञानकारणकारणः । सोऽप्येवं न च ततोस्तज्ज्ञानादपि तद्गतिः॥१०१॥ यः क्वचिद् नालिकेन्द्वीपगसिप्रत्ययः, केवलानलपाहिज्ञानकारणकारण: देवादयोगोलकाङ्गारादिनानसमुत्थः, सोऽपि एवं गृह्यमाणधूमहेत्वग्निगोचरसमनन्तराऽविकलः । न च महत्व नहीं है किन्तु ज्ञायमान धम को कारणता के प्राश्रयभूत अग्निरूप कारण को विषयता से समनन्तर प्रत्यय की महत्ता है जो नालिकेर द्वोपवासी के धूमज्ञ ' में नहीं है-शंका: (समनन्तर प्रत्यय होने पर भी एक कारण, दूसरे नहीं) बौद्ध का कहना यह है कि जिस नालिकेर द्वोपचासी पुरुष को पूर्व में धूमज्ञान कभी नहीं है उस पुरुष को धूमज्ञान के पूर्व जो अग्निज्ञान होता है वह अग्निज्ञान, और जिस व्यक्ति को धूम एवं अग्नि का अविनामाव पूर्व में गृहीत हो चुका है उस व्यक्ति को जो घूमशान से पूर्व-अग्निज्ञान होता है वह अग्निज्ञान, ये दोनों ही अग्निज्ञान यद्यपि धूम ज्ञान के समनन्तर पूर्व है फिर भी उनमें तुल्यता नहीं है, क्योंकि पूर्व व्यक्ति का प्रग्निजान जायमान धूम की कारगता के श्राश्रयभूत अग्नि को विषय नहीं करता है और दूसरे व्यक्ति का अग्निज्ञान, अग्नि के अनुमान रूप कार्य के कारणभूत धूमज्ञानरूप कार्य का कारणभूत है, क्योंकि वह सामान्य रूप से प्रर्थात् धूमहेतुत्व को विषय न कर के भी दृश्यमान धूम के वस्तुगत्या हेतुमूत अग्नि को विषय करता है । किन्तु इतरव्यक्ति-नालिकेर द्वीपवासो का उक्त अग्निजान दृश्यमान धूम के हेतुभूत अग्नि को विषय नहीं करता, क्योंकि उस ध्यक्ति को धूम और अग्नि उससे पूर्व सवा अज्ञात रहे हैं । अतः इसके अग्निज्ञान को प्रमहेतुभूत अग्निविषयक नहीं कहा जा सकता । कहने का तात्पर्य यह है कि धूम के कारण भग्नि को विषय करने वाले समनन्तर ज्ञान के उत्तर काल में उत्पन्न होने वाला घूमज्ञान ही धर्म ग्राहक विषया धम के अग्निव्याप्तिरूप धर्म का ग्रहण कर अग्नि का अनुमापक होता है । नारिकेल द्वीपकासी को धमज्ञान प में उत्पन्न भी प्रग्निशान अमजमक अग्नि को विषय न करने से उसका धमज्ञान धमजनक अग्निविषयक समनन्तर ज्ञानपूर्वक नहीं हुआ है । अतः उस धूम शान से अग्निव्याप्ति का ग्रहण न होने के कारण उससे अग्नि के अनुमान को प्रापत्ति नहीं हो सकती ॥१००।। १०१ वी कारिका में बौद्ध के उक्त अभिप्राय का निराकरण किया गया है'नज्ञाने प्रो' इति प्रत्यन्तरे।
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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