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________________ १५८] पराभिप्रायमाह - -- [ शा० वा० समुच्चय स्त०४-०९६ वस्तुस्थिपा तयोस्तव एकेनापि तथाग्रहात् । नो वाकं न चैकेन द्वयोर्ग्रहणमस्त्यदः ||६६॥ " 1 वस्तुस्थित्या पौर्वापर्यभावेन तयो:- हेतु-फलयोः, तत्त्वे = तज्जननादिस्वभावत्वे, एकेनापि धर्मिग्राहकेण तथाग्रहान् = तदभिन्नतद्धर्मप्रकारकग्रहात् नो बाधकं प्रागुक्तम् । न वादः = एतत्, एकेन द्वयोर्ग्रहणमस्ति, धर्म-धर्मिणोरनर्थान्तरत्वात्, एकेनैकस्यैव ग्रहात् ||६६ || एतत् परिजिहीर्ष माह- तथाग्रहस्तयोर्नेतरेतरग्रहणात्मकः I कदाचिदपि युक्तो यवतः कथमबाधकम् ॥९७॥ तयो:--हेतु-फलयोः, तथाग्रह: - तज्जननस्वभावत्वादिना ग्रहः इतरेतरग्रहणात्मकः= घटकग्रह सापेक्षग्रहरूपः, धर्मिमात्रग्रहात न कदाचिदपि युक्तः, अतः कथमबाधकं प्रागुक्तम् १ | aft स्वलक्षणाध्यक्षं स्वस्य याथात्म्ये प्रमाणम्, क्षणिकत्व-स्वर्गप्रापणशक्त्यादावपि तथास्वप्रसङ्गात्, "यत्रैव जगवा" राय व्यापावाले ॥६७॥ ( कारण और उसका स्वभाव अभिन्न रूप से गृहीत होगा- बौद्ध) ६६ वीं वारिका में पूर्वोक्त दोष का बौद्धसम्मत समाधान प्रदर्शित किया गया है बौद्ध का कहना है कि कार्य और कारण का एक ज्ञान से ग्रहण नहीं होता है यह ठीक है किन्तु इससे कार्य कारण भाव के ग्रहण में कोई बाधा नहीं हो सकती। क्योंकि दोनों में पाँवापर्य होता है अर्थात् कार्य-कारणभाव समकालीन में नहीं किन्तु पूर्वापरकालीन में होता है। इसलिये कारण में कार्यजनन स्वभाव और कार्य में कारणजन्यस्वभाव रहता है। वह स्वभाव कारण कार्य का धर्म होता है. अत एव कारणरूप धर्मी के ग्राहक ज्ञान से उसके कार्यजननस्वभावरूप धर्म का और कार्य के ग्राहक ज्ञान से उसके कारणजन्य स्वभाव का ग्रहण हो सकता है। यह कारण एवं कारणस्वभाव और कार्य एवं कार्यस्वभाव का ग्रहण एक ज्ञान से दो का ग्रहण रूप नहीं है, क्योंकि धर्म और धर्मो में मेद न होने से उनके ग्रहण को उभयग्रहण नहीं कहा जा सकता है क्योंकि उपरोक्त प्रतिपादन के अनुसार एक से एक का ही ग्रहण फलित होता है ||६| 6 वीं कारिका में इस बौद्ध अभिप्राय का परिहार किया गया है ( धर्मिग्राहक से धर्मग्रह होने में क्षणिकत्व प्रत्यक्ष की प्रापत्ति ) ग्रन्थकार का कहना है कि कारण और कार्य का उक्त स्वभाव से जो ग्रहण होता है वह इतरेतरग्रहण रूप है, अर्थात् कारण-स्वभावों के ग्रहण में उस स्वभाव की कुक्षि में प्रविष्ट कार्यज्ञान की और कार्य के उक्त स्वभाव में घटक कारणज्ञान की भी अपेक्षा है । अतः कारणरूप धर्मी मात्र के ज्ञान से तथा कार्यरूप धर्मोमात्र के ग्रहण से उनके स्वभाव का ग्रहण कदापि नहीं हो सकता । अतः कार्यकारण भाव के ग्रहण में जो बाघक बताया गया है वह प्रबाधक नहीं हो सकता उसका बाधara प्रक्षुण्ण है क्योंकि प्रध्यक्ष यानी प्रत्यक्ष स्वलक्षणशुद्धवस्तु का ग्राहक होता है । वह वस्तु के
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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