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________________ स्या का टीका-हिन्दीविवेचना ] [ १३१ दकानां संख्या-परिमाण-पृथक्त्वादीनां चैक एवायम् , तदभिप्रायेणैव समवायकत्वावादा, युक्तं चैतत् , इत्थमेव चक्षुःसंयुक्तघटादिसमवायात् पटत्वादेः प्रत्यक्षानापसेः' इति वदन्ति । तदपि न, गुणत्वावच्छेदेन गुणिस्वरूपसंबन्धत्वकल्पनादतिरिक्तसंबन्धकल्पनानौचित्यात् । 'जले स्नेहस्य समवायः, न गन्धस्य' इति प्रतीतिवद् 'घट-रूपयोः संबन्ध एव न घट-रसयोः संबन्ध' इति प्रतीतेरषि सत्वात् , अतिरिक्तसमवायाननुभवात् अपृथग्भावस्यैव समवायपदार्थत्वात् । क्यों की जायेगी ! और तब 'समवाय एक ही होता है' इसप्रकार का प्रवाद जो दार्शनिक जगत् में प्रसिद्ध है उसको उपपत्ति से होगी ? इस प्रश्न का उत्तर रूपादि के समवाय को अनेक माननेवालों की ओर से यह दिया जाता है कि जिन गुणों का देश काल और अवच्छेदक समनियत है ऐसे संख्या परिमाण पृथक्त्व प्रादि जो अनेक गुण हैं उन सभी का एक ही समवाय संबन्ध होता है गोंकि उनके समवाय सबन्ध को एक मानने पर इस प्रकार को प्रापत्ति सम्भव नहीं हो सकती कि 'उक्त गुणों में से जहाँ एक गुण है वहीं मी गुणान्तर को अधिकरणता हो जायेगी या जिस काल में एक गुण अहां है उसी काल में वहाँ गुणान्तर को अधिकरणता हो जायेगो अथवा पढ़ेशावच्छेवेन जहाँ एक गुण है वहाँ तत्देशावच्छेदेन गुणान्तर की अधिकरणता की प्रापत्ति मा जायेगी'-क्योंकि परमवाय पो ही गुणों के सामान्य रूप नो मान्य है जिन का प्राधय प्रौर ऐश काल रूप प्रयच्छेचक समान है और ऐसे गुणों के समवाय संबन्ध की एकता को दृष्टि से हो दार्शनिक जगत में समवायसम्बन्ध के एक होने का प्रवाद प्रचलित है। तथा उचित भी यही है कि रूप स्पर्शादि गुण और घटत्व पटत्वादि जातियों का समवाय अनेक माना जाय क्योंकि ऐसा मानने पर ही घट मात्र के साथ चक्षु संयोग होने पर चक्षुसंयुक्त घटसमवायरूप संनिकर्ष से पटरवादि के प्रत्यक्ष की अनुत्पत्ति का समर्थन हो सकता है। अन्यथा घटत्व, पदत्यादि का समवाय एक होने पर पट के साथ चक्षु का संयोग न होने पर भी घट के साथ चक्षुसंयोग होने से पटत्व के साथ चक्षु का संयुक्तसमषाय संमिकर्ष सम्भय होने से पटत्व के प्रत्यक्ष को प्रापत्ति का परिहार दुष्कर होगा। [अनेक समवाय पक्ष में प्रतिगौरव दोष-उत्तर पक्ष] किन्तु यह कथन भी ठीक नहीं क्योंकि इस पक्ष में भी जिन गुणों का प्राश्रय, देश और कालरूप प्रयच्छेदक समनियस नहीं है तथा जो जातियां समनियत नहीं है उन सब का विमिन्न समचाय और संख्या परिमाण प्राधि का एक समवाय ऐसी कल्पना होती है। ऐसी स्थिति में गरणी के साथ सभी गुणों का और व्यक्तियों के साथ जाति का स्परूप संबन्ध मानना ही उचित है क्योंकि स्वरूप संबन्ध पक्ष में किसी अतिरिक्त पदार्थ की कल्पना करनी नहीं होती बल्कि गुण जाति प्रावि के प्रमाणसिद्ध स्वरूपों में संबन्धत्व मात्र को कल्पना करनी होती है और समवाय पक्ष में अतिरिक्त अनेक समवाय एवं संख्या परिमाण प्रावि समनियत प्राश्रय और देश-कालयाले गुणों के समवाय की कल्पना करनी पड़ती है और उन सब में सम्बन्धस्य की कल्पना और अनन्त पदार्थ के भेद को कल्पना करनी पड़ती है जो प्रतिगौरवग्रस्त होने से अनुचित है । एवं यह भी ध्यान देने
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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