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________________ १३० ] [शा.पा.समुच्चय स्त-४ श्लोक-६५ यत्तु 'एकस्यैव समवायस्य किश्चिदधिकरणावच्छेदेन रूपसंबन्धत्वकल्पनेनैव व्यवस्थोपपत्तिः, इति-तन्न, रूपसंवन्धत्वं हि रूपप्रकारकविशिष्टज्ञानीयसंसर्गताख्यविषयताशालित्वम् , तच्च तत्तदधिकरणावच्छेदेन तत्तदधिकरणान्तर्भावेन विशिष्टधीहेतुनयैव निवहतीति महागोस्वात् , अस्माकं तु रूपप्रकारकविशिष्टयोधे रूपसंबन्ध एव तन्त्रमिति लाघवात् । किञ्च, एवं 'रूपसंबन्धे न रूपसंबन्धत्वम् इति व्यवहारः प्रामाणिकः स्यात् । ___ अन्ये तु-'रूपि-नीरूपिठ्यवस्थानुरोधाद् नानव समवायः, समनियतकाल-देशावच्छे. भी ठीक नहीं है क्योंकि प्रतियोगिता अनुयोगिता अतिरिक्त पदार्थ नहीं है। प्रतः वायुनिष्ठ अनुयोगिता वायुरूप और रूपनिष्ठप्रतियोगिता रूपात्मक है। अब वायु रूप और समवाय तीनों ही सिद्ध है तब समवाय में वायुनिष्ठानुयोगिता निरूपित रूपनिष्ठप्रतियोगिताकत्व नहीं है यह कहना कठिन है। [निरवच्छिन्न सम्बन्ध अधिकरणतानियामक नहीं हो सकता] बहुत से विद्वानों का यह कहना है कि-'समवाय एक ही है-बही रूपस्पर्शादि सभी का सम्बन्ध है किन्तु उसमें रूपसम्बन्धत्व पृथिव्यादिद्रव्यावच्छेदेन है वायु प्रादि व्यावच्छेदेन नहीं है, और जो जिसका निरवच्छिन्न सम्बन्ध होता है वही उसमें उसको प्रधिकरणता का नियामक होता है । अतः समवाय में वायु प्रादि द्रव्यावश्लेबेन रूपसम्बन्ध न होने से समवाय वायु में रूप प्रादि का वृत्तिता नियामक नहीं हो सकता। अत एव पृथिव्यादि में रूपित्व और वायु प्रादि में नीरूपत्व की व्यवस्था समवाय सम्बन्धवादी के पक्ष में भी विना किसी बाधा के उपपन्न हो सकती है किन्तु यह ठोक नहीं है क्योंकि रूपसम्बन्धस्व का अर्थ है रूपप्रकारक विशिष्टज्ञानीय संसर्गता, यह वायु प्रादि द्रव्यावच्छेवेन समवाय में नहीं है और पृथिव्यादिद्रव्यावच्छेदेन समवाय में है यह मानना तभी सम्भव हो सकता है जब तत्तवधिकरणावच्छेदेन तत्तत्सम्बन्ध को तत्तद् अधिकरणावच्छेदेन तत्तद्धर्म की विशिष्ट बुद्धि के प्रति कारण माना जाय। किन्तु ऐसा मानते में रूपादिविशिष्ट बुद्धि के कार्य-कारण माय के शरीर में तत्तवधिकरण का अन्तर्भाव होने से महान् गौरव होगा, जब जैन मत में रूपप्रकारकविशिष्टबुद्धि के प्रति रूपसम्बन्ध को कारण मानने में लाघव है। क्योंकि, कार्य कारण भाव के गर्भ में रूप के प्राधिकरण का अन्तर्माव नहीं करना होता है। उसके अतिरिक्त समवाय में पृथिव्याक्तिव्यावच्छेवेन रूपसम्बन्धस्व और वायु प्रादि द्रव्यावच्छेदेन रूपसम्बन्धत्यामाय मानने पर 'रूपसम्बन्धेन रूपसम्बन्धत्वम्' इस व्यवहार में प्रामाण्य की प्राप्ति होगी। (अनेक समवायवादी का पूर्वपक्ष) अन्य विद्वानों का कथन है कि रूपवान् और निरूप को व्यवस्था के अनुरोध से समवाय भी अनेक ही है, जिसमें रूप का समवाय होता है वह रूपवान् जसे पृथ्व्यादि द्रध्य, जहां रूपसमवाय का प्रभाव होता है वह नोरूप होता है जैसे वायु प्रादि । वायु में गुणान्तर का एवं जाति प्रादि का समवाय होने पर मो उसमें रूप का समवाय नहीं होता, क्योंकि रूप का समवाय गुणान्तर के समवाय से मिन्न है। अत: वायु प्रादि में गुणान्तर का समवाय होने पर भी रूपसमवाय का प्रभाव हो सकता है । इस पक्ष में यह प्रश्न हो सकता है कि समयाय अनेक है तो उसकी कल्पना मी
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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