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________________ [ शा. वा० समुच्चय स्त० ४ श्लो० ५२.५३ मुलं--पूर्वस्यैव तथाभावाभावे हन्तोत्तरं कुतः । तस्यैष तु तथाभावेऽसतः सत्त्वमदो न सत् ॥५२॥ पूर्वस्यैव-भावक्षणस्य, तथाभावाभावे-फलरूपेण परिणमनाभाचे, 'हन्त' इति खेदे, उत्तर-फल कुतः १ तस्यैव तुकारणक्षणस्य, तथाभावे-फलरूपेण परिणमनेऽभ्युपगम्यमाने, 'असतः कार्यस्य सत्त्वम्-उत्पत्तिः' अद: एतद् वचनम् , न सत्न्न समीचीनम् , व्याहतत्वादित्यर्थः ॥ २॥ एतेनान्यदपि तदुक्तमयुक्तमित्याह मूल-सं प्रतीत्य तदुत्पाद इति तुच्छामेदं वचः । ___ अतिप्रसङ्गतइचव तथा चाह महामतिः ॥५३।। "तं प्रतीत्य-कारणक्षणमाश्रित्य, तदुत्पादः कार्योत्पादः" इतीदं चचम्तुच्छ = निष्प्रयोजनम् ; यतः कारणाश्रयणं यदि तद्रूपाश्रयणं तदोक्तदोपान् , यदि च तदान तय भावमात्रनिवन्धनस्वभावाश्रयणं तदा अलिप्रसङ्कतश्चैव-विश्वस्यापि तदनन्तरभावित्वेन वैश्व बन सकती तो इसमें बौद्ध को कोई अनभिमति-प्रसम्मति नहीं है । क्योंकि, धर्म का स्वरूप हो वास्तव है और वह अन्य से अटित हो होता है । अतः बौद्धमतमें पूर्वोक्त दोष सम्भव नहीं है। ५१॥ ( कारणपरिणति विना कार्य का असंभव ) ५२ वीं कारिकामें बौद्ध के उक्त परिहार का उत्तर दिया गया है । कारिका का अर्थ:-- पूर्व भावक्षरण का यदि कार्य रूपमें परिणमन न होगा तो यह खेद के साथ कहना पडता है कि उस स्थिति में उत्तर क्षरण रूप कार्य भी कैसे हो सकेगा? प्राशय यह है कि पूर्व अस का उत्तरक्षणरूप में परिणाम स्वीकार करने पर ही कार्य की उत्पत्ति हो सकती है । क्योंकि कारण के परिणमन से अतिरिक्त कार्य की सत्ता प्रामाणिक नहीं है । यदि कारण क्षण का कार्यरूप में परिगमन माना जायेगा, अर्थात् सत् कारण क्षण यही सत्कार्य रूप से परिणत होती है यह अगर स्वीकार्य है तब प्रसत कार्य जस्पन्न होता है यह कहनाव्याहत है अथीत स्वीकृति से बाधित है। [ कारणक्षण के आश्रयण से कार्योत्पत्ति-कश्न को प्रसंगति ) ५३ वी कारिका में बौद्ध के एक अन्य कथन को भो प्रयुक्तता बतायो गई है। कारिका का अर्थ इस प्रकार है:-ौज का कहना है कि-'कारण क्षरण का आभय लेकर कार्य उत्पन्न होता है ।'-किन्तु यह कथन निरर्थक-प्रथहीन है। क्योंकि "कायं कारणक्षण' का प्राश्रय लेता है" इसका तात्पर्य यदि यह हो कि कारण के ही किसी रूपविशेष को कार्य ग्रहण करता है तो असत् की उत्पत्ति मानना असङ्गत हो जाता है, क्योंकि कारण सत् होता है प्रत एब उसके रूप का ग्रहण असत् में (प्रसत् से) सम्भव महीं है। यदि कार्य को कारणक्षण का प्राश्रय लेने का अर्थ यह हो कि कार्य एक ऐसे स्वभाव को प्रहरा करता है जो कारण क्षण के अनन्तर होने मात्र से प्राप्त होता है तो प्रतिप्रसङ्ग होगा। क्योंकि एक कारण क्षरण के उत्तर कोई एक ही कार्य नहीं होता अपि तु सारा विश्व हो होता है । जो स्वभाव
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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