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________________ शास्त्रार्त्तासमुचय-बक १०१०१ प्राग्जन्मकृतगौवधादितोऽपि नरका जुत्पश्यापतेः । ' तज्जन्मकृत०' इति प्राग्वर्तिगोषविशेषणे वप्रसिद्धिः" व्यपास्तम्। न चापूर्वास्वीकारेपान यवस्थानुपपतिः, प्रधानावृतत्वादिनाकुलम् गुसवा-हत्याहुः | तदसत् तत्कियोदेशेनान्यप्रायश्चित्ते कृतेऽपि फलानापतेः । 'तुचत्प्रायश्चिवाभाजनिवेशान् ततम्प्रायगिविन्दितातिरिकमस्य व्यापारत्वाद्वा नानुपपतिरिति चेत् तथाऽपि तस्यानक्रियया भोगापत्तिः । तद्ध्वंसातिरिक्तत्वमपि निवेशनीयमिति तू तथा सस्यानन भोगावापमः । चरमभोगा १९४ इसके उमर में यह कहना कि "तप्रायश्वित के पूर्ववर्ती गोवादिजन्य नरक भावि के प्रति ही ततरवायवलयंस को प्रतिबन्धक मानने से यहीं नहीं है, क्योंकि वर्तमान जन्म में गोषध के बाद प्रायश्चित करने पर वर्तमान जन्म के गोवध से सो मरक प्राप्ति नहीं होती, किन्तु पूर्वजन्म में किये गये गोवध से तो नरक प्राप्ति होती ही है, किन्तु करीति से प्रायवित्तध्वंस की प्रतिबन्धक भागने पर पूर्व में किये गये गोबध से भी तरफ की उत्पत्ति का प्रतिबन्ध हो जायगा क्योंकि पूर्वजन्मकृत गोयध भी प्रायदिवस का पूर्ववर्ती गोध है अतः उस गोषध से प्राप्त होने वाला नरक भी प्रति बध्य कोटि में अपना इस दोष के निवारणार्थ यदि पूर्ववर्ती गोवध में 'तज्जन्मकत' विशेषण देकर तत्प्रायसि तम्मत मोघमभ्यनरक के प्रति तत्समाय दिवसको प्रतिबन्धक माना जायगा तो जिस जन्म में गोवचनम से प्रायश्विच करने के बाद गोवध हुआ. पायवपूर्ववत जम्मत गोवध की सिद्धि होने सेवक रीया प्रति प्रतिबन्धमा सकेगा। किन्तु यह सब दोष प्राथवाभावकर्म को कालान्तरमाया कर्मफल के प्रति कारण मानने पर नहीं हो सकते। [प्रधान भाव अनुपपांस का परिहार ] 'अपूर्व न स्वीकार करने पर कर्मों में मङ्ग-प्रधानभाव की उवस्था न हो सकेगो, क्योंकि उस पक्ष में अवान्तर अपूर्व का अनक कर्म न होता है और परमापूर्व का तक कर्म प्रधान होता है। यह बात न बन सकेगी यह शंका भी नहीं की जा सकती क्योंकि अपूर्व न मानने पर अङ्ग-प्रधान की व्यवस्था के लिये यह कहा जा सकता है कि जिस कर्म की कथमता अमुक कर्म किस प्रकार किया जाय इस आकाशा से मो कर्म विहित होता है वह अन होता है। अतः अपूर्व स्वीकार न करने पर कर्मों में अङ्गभाव की व्यवस्था में कोई बाधा नहीं हो सकती । लम का अपहरण सैद्धान्तिकपरम्परा के विरोधी नैयायिकों का अपूर्व के सम्बन्ध में उस पर्चाछोधन ठीक है क्योंकि गवामयत्क्रिया को फलजनक मानने पर सि क्रिया के उद्देश्य से कियान्तर का प्राचाश्चस कर दिया जायगा उस किया के फल की प्रत्पत्ति न हो सकेगी, कारण यह क्रिया भी प्रायश्विसाभाषषक्रिया नहीं होगी। "प्राय
SR No.090417
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 1
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherChaukhamba Vidyabhavan
Publication Year
Total Pages371
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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