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________________ 141 स्पा १० टीका -fi.पि. ननु तथापि पूर्वावस्यानाशेयोत्तरावस्याभ्युपगमात् तन्त्वादिपरिणामनाशेनैव पटादिशति है, पा भग्य छ,' यह दूसरी बात है इस विषय में कोई मान नहीं है। घटक अंशों से सोधे प्रष्य की उत्पत्ति मानने पर यह भी एक लाभ होगा कि जैसे दातानुक पर के मम्तिमा के सलग होने पर भी नयनम्नुकपट की उपलधि होती है, उसी प्रकार प्रथमतस्तु के अलग होने पर भी नवतन्तकण्ट की उपलब्धि निर्वाध हो सकती है, पयोंकि जैसे प्रथम से मयस्यस तन्तुओं से नवतन्तुकपद की उत्पत्ति होतो. उलो प्रकार तूसो तन्तु से वश नक के नषनातुओं से भी पट की इापति अपरिहार्य है। [एक काल में अनेक पटों की भापति] सा पो पर हो की ....असम : द की उत्पनि मानने पर पूर्वपठ के नाश के पार की उत्तरपद की पति होने से, परासन्तुकपट के काल में सही तन्तुषों में मन्यपट का मस्तित्व को नहीं हो सकता, क्योंकि पूर्वपटो का नारा होकर ही वशतामुकपट उत्पन्न होता है. पर प्रतिलोमनाम से वासनमुकार के काल में भोकपटों के अस्तिरब की आपत्ति अवश्य होगी. क्योकि अमे नुसरे तन्तु से वश तन्तु तक के नवतस्तुभी से मचतम्तुकपट की उत्पनि होगी उसी प्रकार तीमो तन्तु से उसो त क बाट सम्भों से गटनम्नुकाट, पचं बौथे सन्तु से इस तक के मास सम्मो से साततन्तुकापट आदि को भी उत्पति हो सकती है।" [एकाकस्वभाव भाव होने से इस्टम्पत्ति] इस शंका का उत्सर यह है कि-यह आपति इष्ट है, पोंकि पकस्वभाव मौर ममेकम्यमाष में कोई विरोध नहीं है । जो पस्तु किसो दृष्टि से एक है, दुसरी स्टि से वही अनेक भी हो सकती है, अतः यह स्वीकार करने में कोई संकट नहीं हो सकता शुओं की संयोग होने पर शतन्तुक पकपद भी उम्पन्न होता है, और साथ ही नवतन्तुक आदि गर्नकपट भी उत्पन्न होने है । 'वातन्तुक पट के समय यति मष सन्तुक, अष्टसन्तुक मावि अन्य पट भी रहते हैं तो उस समय उनकी उपलधि क्यों गादों होती इस प्रश्न का उत्तर यह है कि पक, दो तीन आणि तन्तुमा के संयोग का विगम नवतन्तुक, अष्टनातुक, सप्ततन्तुक बावि पटों का अभिव्यम्मक, वातन्तुक पर के समय इन अभिव्यको का अभाव होने से उस समय विद्यमान होते हुये भी उन परों को सपलब्धि नहीं होती । यही सबब है जिससे महान पट में 'एकः पटः' इस प्रतीति को अनुपात नहीं होती। यान महान पट के अस्तित्वकाल में उसको उपलब्धि भनेक पट के रूप में होती तो पफपट के रूप में उसकी प्रतीति भनुपणान हो जाती। अथषा यह भी कहा जा सकता है कि जैसे भूतल के साथ अक्युलि का संयोग होने पर, हस्त, शरीर मावि के अनेक संयोग को उत्पत्ति होती है, पर उपलब्धि भलिसंयोग को ही होनी है. भस्य संयोगो को नहीं होनी. इसी प्रकार एक महान पट के मस्तित्वकाल में अन्य अनेकलघुपों के होने पर भी पक महान पद की उपलब्धि होने के कारण भग्य पदों की उपलब्धि नहीं होती। पटक18 में सन्तुओ का प्रतीति न होने का आपत्ति-और परिहार शंका रो सकती है कि परमाणुगत अतिशय से प्रम्प की सीधी उत्पत्ति मानने के पक्ष में भी पूर्व प्रवस्या का नाश होने के बाद ही उत्तर मयस्था की उत्पति
SR No.090417
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 1
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherChaukhamba Vidyabhavan
Publication Year
Total Pages371
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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