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________________ १३४ शास्त्रवार्त्तासमुच्चय- स्तबक १ श्लो० ४२ अथ "विशिष्टज्ञानस्यापि धर्म्यंशे स्वप्रकाशत्वांशे च ग्रामाण्यमेव, अतो धर्म्यंशेप्रामाण्यज्ञानाभावात् तदंशे ततः प्रवृत्युपपत्ति शुत्यादौ 'इदं रजतमित्यादिज्ञानानां च विशिष्टवासनोपनीतरजताद्यलोकधर्म्यवगाहित्वाद् व्यवहारवाया, 'सर्वे ज्ञानं धर्मिण्यभ्रान्तम्' इमि प्रवादश्वानुपपन्न'" इति चेत् ? न विशिष्टवासना सामर्थ्याविशेषे विशिष्टज्ञानमात्रस्यैव विशिष्टालीकर्मिविषयसम्भवात् सम्यङ् मिथ्याज्ञानविभागार्थमेता सृष्ट्यादरे चैकत्र धर्मिणि प्रकारीभूतधर्मसम्, अन्यत्र च तदसस्वमित्येतावन्मास्यैव लाघवेनाश्रयत्वात् । 'इदं रजतमित्यत्र पुरोवर्ति रजतमनुभूयते, अतस्तदेशेsati रजतं कल्प्यते सत्यम्य तु नैवं सत्यस्यैव पुरोवृत्तित्वात् इति विशेषाद् नोक्कापत्तिरिति चेत न, 'इदमितिविषयतायाः क्षयोपशमविशेषनियम्यतया तदनुरोनातिरिकाकल्पनात्, अन्यथाऽनन्ताचीकरजताद्युत्पत्तिविनाशतत्वादिकल्पने गौरवाद, अज्ञातधर्मिणि प्रवृत्यनुपपत्तेश्चेति । अधिकं प्ररहस्ये । · विशेषदर्शी है, उसे तो यह सदैव निश्चय है कि अनुगत आकार का अभाव होने से उसे विषय करने के कारण सभी विशिष्टज्ञान अप्रमाण है । इस पर यदि यह कहा जाय कि - "धर्मों की सत्ता तो नायक को भी स्वीकार्य है, केवल अनुगतधर्म ही उसके मत में अप्रमाणिक हैं । अतः सविकल्पक ज्ञान के अप्रमाण होने पर भी धर्मीमात्र को विषय करने वाला निर्विकल्पक ज्ञान तो उसके मन में प्रमाण है अतः उस ज्ञान से धर्मो का व्यवहार व धर्मी में प्रवृत्ति आदि होने में कोई बाधा नहीं है तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि निर्विकल्पकशान से धर्मिमात्रविषयक व्यवहार मानने पर चार्वाक की ओर से यह कहना असङ्गत हो जायगा कि 'शास्त्रोक्त अनुमान ही क को अमान्य है किन्तु लोकव्यवहार का प्रवर्तक लोकसि अनुमान उसे भी मान्य है', साथ ही यह बात भी असङ्गत है कि निर्मिकल्पकशान से व्यवहार की उपपत्ति हो जाने के कारण व्यवहार का लोप नहीं होगा' क्योंकि निर्विकल्पक के afone का होना सभी को मान्य है, भले धड प्रमाण न हो। तो जब सविकल्पक द्वारा निर्विकल्पक व्यवद्दित हो जाता है, तब व्यवहार के अव्यवहितपूर्व उसका अस्तित्व न होने से उसके द्वारा व्यवहार का निर्वाह कैसे हो सकता है ! (धर्मों और स्वप्रकाशत्व दो अंश में प्रामाणिकविशिष्टज्ञान से प्रवृत्ति उपपत्ति की शंका ) यदि यह कहा जाय कि - "विशिष्टज्ञान भी धर्मी अंश में और स्वप्रकाशत्वश में प्रमाण ही होता है, इसलिये धर्मी अंश में उसमें अप्रामाण्य का ज्ञान न होने से उसके द्वारा धर्मी में सफल प्रवृत्ति हो सकती है। धर्मी में प्रमाणभूत विशिष्टज्ञान से धर्मी में सफलप्रवृतिरूप व्यवहार मानने पर शुक्ति में होने वाले 'इदं रजतम् = यह रजत है इस कान से भी धर्मी में रजतार्थो सफलप्रवृत्तिरूपव्यवहार की आपत्ति होगी, यह शंका नहीं की जा सकती, क्योंकि शुक्ति में होने वाला रजतशान धर्मोरूप में वास्तव रजत को विषय न कर विशिष्टवासना से उपस्थित असत्य रजत को विषय करता है, अतः उस =
SR No.090417
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 1
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherChaukhamba Vidyabhavan
Publication Year
Total Pages371
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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