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________________ ३४ ] प्रकीर्णक-पुस्तकमाला Seeeeeeeeeeeeeeeeee निर्वाणकाण्ड और अपनश निर्वाणमक्तिमें भी यही बतलाया है। यथा (क) पावाए हिन्दो महावीरो-निः का० गा.१ (ख) पावापुर बंदाई वडूमाणु. जिणि महियाल पयदिउ विमलणाणु। अ. नि. भ. । यह पावापुर भी विहारप्रान्तमें है और पटनाके निकट है जो गुरगावासे १३ मील की दूरीपर है और जहाँ मोटर, ताँगे आदिसे जाते हैं । यहाँ कार्तिक वदी अमावस्याको भगवान महावीर के निर्वाण दिवसो. पलक्ष्यमें एक बड़ा मेला भरता है । यहाँ बीरजिनेन्द्रकी सातिशय मूर्ति रही है जिसका मदनकोतिने उल्लेख किया है। ५. गिरनार (ऊर्जयन्तगिरि) यहाँ से २२वें तीर्थकर अरिष्टनेमिने निर्वाण प्राप्त किया है और असंख्य ऋषि-मुनियोंने भी यहाँ तप करके सिद्धपद पाया है । अतएव यह सिद्धतीर्थ है। आचार्य पूज्यपादने कहा है कि जिन 'अरिएनेमिः की इन्द्रादि और जैनेतर साधुजन भी अपने कल्याण के लिये उपासना करते हैं उन अरिष्टनेमिने अष्टकोको नाशकर महान् उर्जयन्तगिरि -गिरनारसे मुक्तिपद प्राप्त किया।' यथायत्प्राय॑ते शिवमय विबुधेश्वरायः ।। पास्वरिष्ठभिश्च परमार्थ-गवेष-शीलैः । नष्टाऽट-कर्म-समये तदरिष्टनेमिः सम्प्राप्तवान क्षितिधरे बृहदूर्जयन्ते ।।२३।।
SR No.090415
Book TitleShasana Chatustrinshika
Original Sutra AuthorAnantkirti
AuthorDarbarilal Kothiya
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1949
Total Pages76
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size1 MB
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