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________________ तृतीय प्रकाया अर्थ-साधारण और प्रत्येक भेदसे वनस्पतिकायिक जोव दो प्रकारके हैं। पृथिवी तलपर जिनके श्वास तथा आहार आदि एक हैं अर्थात् एकके श्वास लेनेपर सबको श्वास ली जाती है योर एकके आहार करनेपर सबका आहारहो जाता है एवं जिनके एक शरीरमें अनन्त जीव रहते हैं वे साधा ते गए हैं हाहगा दर नि"द है। नित्य निगोद और इतर निगोदके भेदसे निगोद दो प्रकारके माने गये हैं। जिन जोवोंने कभी निगोदसे अन्य पर्याय नहीं प्राप्त की है और कर्मोको विचिप्रतासे कभी प्राप्तभो नहीं करेंगे वे दुःख उठाने वाले नित्यनिगोद हैं। इस नित्यनिगोदमें कितनेही जीव जिनेन्द्र भगवान्ने ऐसे बतलाये हैं कि जिन्होंने आज तक दूसरी पर्याय प्राप्त तो नहींको है परन्तु प्राप्त करेंगे। निगोदसे निकलकरजो अन्य जोवोंमें भ्रमण करते हैं और पुनः उसीमें जा पहुँचते हैं वे इतरनिगोद हैं इन्हींको चातुर्गतिक निगोद भी कहते हैं। जिनमें एक शरीरका एक जीवही स्वामो होता है उन्हें जिनेन्द्रदेवने प्रत्येक कहा है। जिनका आश्चय पाकर अन्य स्थावर जीव रहते हैं जिनागममें उन्हें सप्रतिष्ठित प्रत्येक कहा है। जिनके शरीरमें अन्य स्थावर जोव नहीं रहते वे आम आदि अप्रतिष्ठित प्रत्येक कहे गये हैं। जो साधारण हैं, सप्रतिष्ठित हैं और जिनके शरीर में असजीव रह रहे हैं वे वनस्पतियाँ दयालु पुरुषों द्वारा खाने योग्य नहीं हैं। ___ मावार्थ-जो मूल शेज हैं जैसे आलू, घुईया, सकरकन्द, अदरक, मूलो आदि तथा तोड़नेपर जिनका समभङ्ग होता हो जैसे धनंतर आदि के पत्ते आदि साधारण हैं। साधारण जोवोंमें एक शरीरके अनेक जीव स्वामो होते हैं परन्तु सप्रतिष्ठित प्रत्येको एकके आश्रय रहनेवाले जोव अपना-अपना स्वतन्त्र शरीर लेकर रहते हैं। प्रत्येकमें एक शरोरका एक हो स्वामो होता है-जैसे आम, अमरूद आदि । परन्तु जब तक इनका पूर्ण विकास नहीं हुआ है तब तक वे सप्रतिष्ठित प्रत्येक हैं अर्थात् अनेक जोबोंके आधार हैं। गोभी तथा अमर कटूमय आदिमें त्रस जोवभी रहते हैं अतः दयावन्त जीवोंके द्वारा भक्ष्य नहीं हैं-खाने योग्य नहीं हैं। यहाँ एक बात यह भी ध्यातव्य है कि आजकल कुछ लोगोंमें जो यह धारणा चल पड़ी है कि वृक्षसे तोड़ लेनेपर फल निर्जीव हो जाता है उसे अचित्त करनेको आवश्कता नहीं है, यह धारणा आगम सम्मत नहीं है क्योंकि एक वृक्षमें वृनका जीव अलग रहता है और उसके आधारपर उत्पन्न होनेवाले फलों तथा पत्तोंमें उनका जीव अलग रहता है अतः
SR No.090411
Book TitleSamyak Charitra Chintaman
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year
Total Pages234
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size4 MB
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