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________________ '- -.-.- .- - - - - - -- -- १२५ सम्यवारिन्न-चिन्तामणिः गुणस्थान जानना चाहिये । इस प्रकार मार्गणा स्थानोंमें गुणस्थानोंका निर्देश संक्षेपसे किया है। ध्यानस्थ मुनिको इसका चिन्तवन करना चाहिये। ऐसा चिन्तवन करने वाले योगीका चित्त विषयोंसे हट जाता है और उससे दुःखदायक कोको अत्यधिक निर्जरा होती है ।। ३२.३० ।। अब आगे मार्गणाओंमें सम्यग्दर्शनका वर्णन करते हैं इतोऽग्ने मार्गणामध्ये सम्यग्दर्शनमुच्यते । श्वम्रगत्यनुधावेन प्रथमायो क्षिती भवेत् ॥ ३९ ॥ पर्याप्तकेषु सम्यक्त्वभेवानां त्रितयं पुमः। अपर्याप्तकेषु विशेयोपमिकमन्तरा ॥ ४० ॥ आयतरासु पृथ्वीषु पर्याप्तानां मवेद्वयम् । क्षायिक तत्र नास्त्येवापर्याप्तेषु न किञ्चन ॥ ४१॥ तिर्यग्गत्यनुवादेन तिरश्चां भोगभूमिषु । पर्याप्तानां भवेद् भवत्रयं भव्यत्व शालिनाम ॥ ४२ ।। अपर्याप्तेषु विज्ञेयमोपशामिकमतरा। कर्मभूमिजतिया क्षायिकेण विना भवेत् ।। ४३ ।। द्वयं सम्यक्त्वभेवानां पर्याप्तत्वविशुम्मताम् । अपर्याप्सेषु नास्त्ये सम्यग्दर्शनसौरभम् ॥ ४४ ॥ पर्याप्तेषु मनुष्पेषु त्रिविधा वर्तते सुदृक् । अपयप्तेिषु नास्स्पेम मोहोपशमजा सुदा ॥ ४५ ॥ पूर्णसुवष्यनारीषु क्षायिकी दुग न वर्तते। अपूर्णब्रव्यभामासु गन्धोऽपि न वृशो भवेत् ॥ ४६॥ देवगत्यनुवादेन देवेषु द्विविधेष्वपि । अपर्याप्तासु नास्त्येव सम्यग्दर्शनसौरभम् ॥ ४७ ।। वानादिदेव देवीषु पर्याप्तासु भवेद्वयम । अपर्याप्तासु सम्यक्त्व-भेवो नास्त्येष कश्चन ॥ ४८ ।। अर्थ- यहाँसे आगे मार्गणाओंमें सम्यग्दर्शन कहा जाता है अर्थात् किस-किस मार्गणामें कौन-कौन सम्यग्दर्शन होता है, यह कहते हैं । नरकगतिको अपेक्षा प्रथम पृथिवीमें पर्याप्तक नारकियोंके तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं परन्तु अपर्याप्तक नारकियोंके औपशमिक सम्यग्दर्शन नहीं होता है। तात्पर्य यह है कि प्रथम पृथिवो तक सम्यग्दृष्टि जा सकता है परन्तु औपशमिक सम्यग्दृष्टि मरकर देवगतिके सिवाय अन्य गतियों में नहीं जाता, इसलिये यहाँ उसका अभाव बतलाया है ।
SR No.090411
Book TitleSamyak Charitra Chintaman
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year
Total Pages234
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size4 MB
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