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________________ सप्तम प्रकाश だき ध्याय प्रारम्भ करे । साधुओं को यह सब प्रवृत्ति विनयाचार कहलाती है । विनयसे शास्त्र पढ़ने वाला पुरुष शीघ्र हो श्रेष्ठ विद्वान् हो जाता है । स्वाध्याय करने वाले साधुको स्वाध्यायके समय हाथोंसे पैर, अञ्छण-रेंगे तथा कक्ष - बगलका स्पर्श नहीं करना चाहिये और न नखोंसे शरीरको खुजलाना चाहिये || ३७-४० ॥ आगे उपधानाचारका वर्णन करते हैं- स्वाध्याय गतशास्त्रस्य यावत्पूति जायते । तानिविकृति भुङ्क्ष्ये नंब भुङ्क्ष्ये फलादिक्रम् ॥ ४१ ॥ एवं साधोः प्रतिज्ञा या ह्युपधानं तदुच्यते । यद्वा चित्तं स्थिरीकृत्य निराकृत्याक्षविप्लवम् ।। ४२ ।। स्वाध्यायः क्रियते पुम्भिरुपधानं तदुच्यते । एष उपधानाचारो विज्ञालथ्यो मनोषिभिः ॥ ४३ ॥ अर्थ- स्वाध्याय में स्थापित शास्त्रकी जबतक समाप्ति नहीं हो जाती हैं तबतक में निविकृति - रसहीन भोजन करूंगा अथवा फलादिक नहीं खाऊंगा, साधुकी यह जो प्रतिज्ञा है वह उपधानाचार कहलाती है अथवा चित्तको स्थिरकर और इन्द्रियोंको स्वच्छन्द प्रवृत्तिको रोककर पुरुषों द्वारा जो स्वाध्याय किया जाता है उसे विद्वज्जनोंको उपधानाचार जानना चाहिये ॥ ४१-४३ ॥ अब बहुमानाचारका कथन करते हैं ४६ ॥ स्वाध्यायं विदधत् साधुरितरेषां तपस्विनाम् । अनादरं न कुर्वीत न गविष्ठः स्वयं भवेत् ॥ ४४ ॥ जिनवाक्यमिदं श्रोतुं जातः पुण्योदयो मम । धोतरामस्य वाणीयं भवान्धौ पततो मम ॥ ४५ ॥ सत्यं सुबुद्धनौकास्ति जन्मव्याधियुतस्य मे । परमौषधरूपा हि लक्ष्धा काठिन्यतो मया ॥ श्रोतव्यं बहु मानेनाध्येतव्यं च प्रमोदतः । सर्वथा दुर्लभं ज्ञेयं जिनवाक्यरसामृतम् ॥ ४७ ॥ इश्येवं बहुमानेन स्वाध्यायं विदधाति यः । कृत्तकर्मकलापोऽसौ साक्षाद् भवति केवलो ॥ ४८ ॥ एवं विवतः शास्त्र स्वाध्यायं हि तपस्विनः । प्रयासो बहुमानाद्य आचार: परित्यंते ।। ४९ । अर्थ - स्वाध्याय करने वाला साधु अन्य तपस्वियोंका अनादर नहीं
SR No.090411
Book TitleSamyak Charitra Chintaman
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year
Total Pages234
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size4 MB
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