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________________ सम्पमानवधिका भाषाटीफा ] । ७६५ । बहुरि अगर कोठा लि संजी, जहां संत्री प्राज्ञी की जैसी सं । । सहनानी है। बहुरि उगणीसवां कोठा विर्षे आहार, तहां पाहार-अनाहार की असी प्रा। अन । सहलानी है। बहुरि बीसवां कोठा विर्षे उपयोग, तहां ज्ञानोपयोग - दर्शनोपयोग की असी ज्ञा। द । सहनानी है। असैं इन सहनानीनि करि यंत्रनि विर्षे कहिए है अर्थ सो नीक जानना । ___ बहुरि जहां गुणस्थानवत् वा मूलाधवत् असा कह्या होइ, गुरणस्थान वा सिद्ध रचना विर्षे जैसे प्ररूपणा होइ, सैंसे यथसंभव जानना । बहुरि और भी जहां जिसवत् कह्या होइ, तहां ताके समान प्ररूपणा जानि लेना । तहां जो किछू जिस कोठा विर्षे विशेष कह्या होइ, सो विशेष जानि लेना । बहुरि जहां स्वकीय असा कया होइ, तहां जिसका पालाप होइ, तहां तिस विर्षे संभवती प्ररूपणा वा जिसका पालाप कीजिए, सो ही प्ररूपणा जानि लेना । बहुरि इतना कथन जानि लेना - सम्वेसि सुहमाणं, काऊदा सम्बविग्महे सुक्का । सम्वो मिस्सो वेहो, कोदवसो हवे णियमा ॥१॥ इस सूत्र करि सर्व पृथ्वीकायादिक सूक्ष्म जीवनि के द्रव्यलेश्या कपोत है। 'विग्रहगति संबंधी कार्माण विषं शुक्ल है । मिश्र शरीर विर्षे कपोत है । असे अपर्याप्त आलापनि विर्षे द्रव्यलेश्या कपोत पर शुक्ल ही जानि लेना। बहुरि द्वितीयादि पृथ्वी का रचना विषं लेश्या अपनी अपनी पृथ्वी वि संभवती स्वकीय जाननी । बहुरि मनुष्य रचना विर्षे प्रमत्तादिक विर्षे तीन भेद भाव अपेक्षा हैं । द्रव्य अपेक्षा 'एक पुरुषवेद ही है । बहुरि सप्तमादि गुणस्थाननि विर्षे आहार संज्ञा का प्रभाव, साता‘असाता वेदनीय की उदीरणा का अभाव तें जानना । बहुरि स्त्री, नपुंसक वेद का उदय होते आहारकयोग, मनःपर्ययज्ञान, परिहारविशुद्धि संयम न होइ, असा जानना । बहुरि श्रेणी ते उतरि द्वितीयोपशम सम्यग्दृष्टी चतुर्थादि गुणस्थानकनि तें मरि देव होइ, तोहि अपेक्षा वैमानिक देवनि के अपर्याप्तकाल विर्षे उपशम सम्यक्त्व कहा है। HTRA
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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