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________________ सारिका भाषादीका j ऐकणं तु धन्य, स्निग्धत्वं द्विगुरात्रिगुणसंख्येयाऽ-1 संख्येयानन्तगुणं भवति तथा रूक्षभावं च ॥१६१०॥ टीका -- स्निग्ध गुण जो एक गुण है; सौ जघन्य हैं, जाके एक अंश होइ, ताक एक गुण कहिए। ताकों आदि देकरि द्विगुण, त्रिगुण, संख्यातगुण, असंख्यातगुण अनंतगुणरूप स्निग्ध गुण जानना । तेसे ही रूक्षगुण भी जानना । केवलज्ञानगम्य सब तें थोरा जो स्निग्धत्व रूक्षत्व, ताक एक अंश कल्पि, तिस अपेक्षा स्निग्व रूक्ष गुरण के अंशनि का हा प्रमाण जानना ।' एवं गुणसंजुत्ता, परमाणू आदिवग्गणम्मिठिया । जोग्गदुगाणं बंधे, दोण्हं बंधी हवे नियमा ॥ ६११॥ एवं संयुक्ताः, परमारराव प्रादिवर्गलायां स्थिताः योग्यaratः बन्थे, द्वयोर्बन्धो भवेत्रियमात् ॥ ६१॥ | ક टीका - असें स्निग्ध - रूक्ष गुण करि संयुक्त परमाणू ते प्रथम अणु वर्गरगा विषं तिष्ठे हैं । सो यथायोग्य दोय का बंध स्थान विषे, तिनही दोय परमाणूनि का बंध हो है । नियमकरि स्निग्ध- रूक्ष गुरण के निमित्त तें सर्वत्र बंध हो है । किछू विशेष नाहीं । जैसे कोऊ जानैगा, तातें जहां बंध होने योग्य नाहीं भैंसा निषेध पूर्वक जहां बंध होने योग्य है, तिस विधि को कहे हैं गिद्धणिद्धा ण बज्मंति, रुक्खरुक्खा य पोम्गला । णिलुक्खा य बति रूवारूवी य पोग्गला ॥६१२॥ ferrefeनग्धा न बध्यन्ते, रूक्षरूक्षाश्च पुद्गलाः । ferrerna arora, रूप्यरूपिणच पुद्गलाः ॥६१२॥ टीका - स्निग्ध गुण युक्तं पुद्गलनि करि स्निग्ध गुण युक्त पुद्गल बंधै नाहीं । बहुरि रूक्षगुणयुक्त पुद्गलनि करि रूक्ष गुण युक्त पुद्गल बंधे नाहीं, सो यह कथन सामान्य है । बंध भी हो है । सो विशेष आगे कहेंगे । बहुरि स्निग्ध गुण युक्त
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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