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________________ ५६६ ] [ गोम्मटसार जीवका गाया ५१२-५१३-५१४ टीका - निद्रा जाके बहुत होइ, और को ठिगना जाके बहुत होइ, धन-धान्याfar fat तीव्र वांछा जाके होइ, असा संक्षेप तें नील लेश्यावाले का लक्षण है । रूसदि fरंगददि अण्णे, दूसवि बहुसो य सोय-भय- बहुलो । असूयदि परिभवदि पर, पसंसदि य अप्पयं बहुलो ॥५१२॥ रुष्यति निन्दति श्रन्यं दुष्यंति बहुशश्च शोकभयबहुलः । असूयति परिभवति परं प्रशंसति आत्मानं बहुश: ।। ५१२|| - टीका पर के ऊपरि क्रोध करें, बहुत प्रकार और कौं निंदै, बहुत प्रकार और कौं दुखावें, फोक जाके बहुत होइ, भय जाके बहुत होइ, और कौं नीकै देखि सकै नाहीं ; और का अपमान करें, आपकी बहुत प्रकार बढाई करें । ण य पत्तियवि परं, सो अप्पारण यिव परं पि मण्णंतो । तुसवि अभित्थुवतो, ण य जाणदि हाणिवढि वा ॥५.१३॥२ न च प्रत्येति परं स श्रात्मानमिव परमपि मन्यमानः । तुष्यति अभिष्टुतो न च जानाति हानिवृद्धी वा ।। ५१३।। टीका आप सारिखा पापी कपटी और कौं मानता संता और का विश्वास न करें, जो श्रापकी स्तुति करें, ताके ऊपर बहुत संतुष्ट होइ, अपनी, अर पर की हानि वृद्धि कीं न जानें। - · मरणं पत्थेदि रगे, देहि सुबहगं हि युग्वमाणो वु । ण गणइ कज्जाकज्ज लक्खरणमेयं तू काउस्स ॥५१४।। मर प्रार्थयते रणे, ददाति सुबहुकमपि स्तूयमानस्तु । न गणयति कायाकार्यं, लक्षणमेतत्तु कपोतस्य ॥३५१४ ॥ ठीका दे, कार्य कार्य को गिण नाहीं, असे लक्षण कपोत लेश्यावाले के हैं । युद्ध विषै मरण कौं चाहै, जो आपकी बढाई करै, ताकी बहुत धन १. खंडामधला पुस्तक १, पृष्ठ ३११, गाया सं. २०३ । २. खंडा-बदला पुस्तर्क १, पृष्ठ ३२१, गांधा पं. २०४ । ३. षटुखंडागम-धवला पुस्तक १, पृष्ठ ३९१, गांया सं. २०५१
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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