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________________ -५०५ ] ( तोम्मटसार जीवा ३६४ याजकनामेनाननभेदाणि पदाणि होति परिकम्मे । कावधि वाचनाननमेसो पुरष चूलियाजोगो ॥ ३६४॥ तन मन गोरम, मरगत जयगालनोमनं जजलक्षाणि । मननन धममननोन नामं रनधजवरानन जलादिषु ॥ ३६३ ॥ याजकनामेनाननमेतानि पदानि भवंति परिकर्मणि । Sarraforarearranषः पुरुः चूलिकायोगः ॥ ३६४।। टोका इहां 'कटपयपुरस्थवर्णैः' इत्यादि सूत्रोक्त विधान प्रक्षर ज्ञा करि अंक कहैं हैं; सो अंकनि करि जो प्रमाण भया, सोई वहां कहिए है एक एक अक्षर ते एक एक अंक जानि लेना; सो 'गतनमनोतनं' कहिये छत्तीस लाख पांच हजार (३६०५०००) पद चंद्रप्रज्ञप्ति विष हैं। '' कहिए पांच लाख तीन हजार ( ५०-३०००) पद सूर्यप्रज्ञप्ति विष हैं । बहुरि 'गोरम' कहिये तीन लाख पचीस हजार (३२५००० ) पद जंबूद्वीप प्रज्ञप्ति विषे हैं । T बहुरि 'मरगतatri' कहिये बावन लाख छत्तीस हजार (५२३६०००) प्र द्वीपसागर प्रज्ञप्ति विषं हैं । aft 'जयगाaatri' कहिये चौरासी लाख छत्तीस हजार (८४३६०००) पद व्याख्याप्रज्ञप्ति अंग के हैं । बहुरि 'reter' कहिए प्रयासी लाख ( ( ८८०००००) पद सूत्र सामा भेद विष हैं । बहुरि मननन कहिए पांच हजार (५००० ) पद प्रथमानुयोग विषै हैं । 'बहुरि धमraataar कहिए पिच्या कोट पचास लाख पांच (२५५०००००५) पद पूर्वगत विष हैं। चौदह पूर्वनि के इतने पद हैं । बहुरि रनधजधराने कहिए दोय कोडि नव लाख निवासी हजार दोय से (२०६८९२००) पद जलगता आदि चूलिका तिन विषै एक एक के इतने इतने पद
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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