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________________ [ गोम्मटसार जीवकाण्ड भाषा ३५८-३५६-३६० आधार में यादि देकर विपाक सूत्र पर्यंत ग्यारह अंग, तिनिके पदनि की संख्या कहिए है । ५०४ ] अट्ठारस छत्तीसं, बादालं घडकडी श्रड बि छप्पण्णं । सत्तरि अट्ठावीसं चोदाल सोलससहस्सा ॥३५८ ॥ इगि- दुग-पंचेयारं, लिवोस बुत्तिणउदिलक्ख तुरियादी । चुलसीविरक्मेया, कोडी य विवागसूत्तम्हि ॥ ३५६ ॥ अष्टादश पत्रिशत्, द्वाचत्वारिंशत् अष्टकृतिः अष्टद्विषट्पंचाशत् । सप्ततिः श्रष्टाविंशतिः, चतुश्चत्वारिंशत् षोडश सहलाखि ॥ ३५८ ॥ एकद्विपंचं कायशत्रयोविंशतिद्वित्रिनयतिलक्षं चतुर्थादिषु । चतुरशीतिलक्षमेका, कोटिश्च विपाकसूत्रे ॥ ३५९ ॥ टीका - प्रथम गाथा विषै अठारह श्रादि हजार कहे । बहुरि दूसरी गाथा विषे चौथा अंग आदि अंगनिविषे एकादिक लाख सहित हजार कहे । श्रर विपाकसूत्र का जुदा वर्णन कीया । श्रब इनि गाथानि के अनुसारि एकादश अंगनि की पदनि की संख्या कहिये है । प्राचारांग विषै पद मठारह हजार ( १८०००), सूत्रकृतांग विषे पद छतीस हजार (३६०००), स्थानांग विषे बियालीस हजार (४२०००), समवायांग विष एक लाख अर आठ की कृति चौंसठ हजार (१६४०००), व्याख्याप्रज्ञप्ति विषे दो लाख अट्ठाईस हजार ( २२८०००), ज्ञातृकथा अंग विषै पांच लाख छप्पन हजार, ( ५५६०००), उपासकाध्ययन अंग विषे ग्यारह लाख सत्तर हजार (११७००००), कृतदशांग विषे तेईस लाख अट्ठाईस हज़ार ( २३२८००० ), अनुत्तरोपपादक दशांग विषै बारा लाख चवालीस हजार (२२४४०००), प्रश्न व्याकरण अंग विषै तिराणव लाख सोलह हजार ( ९३.१६०००), विपाकसूत्र अंग विषै एक कोडि चौरासी लाख (१८४००००० ) जैसें एकादश अंगनि विषे पदनि की संख्या जाननी । वापण रमोनानं, एयारंजुगे दी हु वादम्हि । कनजतजमताननमं, जनकनजयसीम वाहिरे वण्णा ॥ ३६० ॥ areturedोनानं, एकदशांगे सिह वादे | कनज जमताननमं जनकनजयसीम बाह्ये वर्षाः ॥३६०॥
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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