SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 344
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ सम्यग्नानचन्तिका भावाटीका । [ ३३० बाह्य कह्या । इनि बिना और प्रस का अस्तित्व असनाली बाह्य नाहीं है; असा अभिप्राय शास्त्र के कर्ता का जानना । " ' आगे वनस्पतीवत् अन्य भी जीवनि के प्रतिष्ठित, अप्रतिष्ठितपना का भेद दिखावे हैं पुढवीआदिचउण्हं, केवलियाहारदेवरिपरयंगा । अपविडिदा णिगोदहि, पदिठिदंगा हवे सेसा ॥२००॥ पृथिव्यादिचतुर्णा, केवल्याहारदेवनिरयांगानि । । .. अप्रतिष्ठितानि निगोदैः, प्रतिष्ठितांगा भवंति शेषाः ॥२०॥ टोका - पृथ्वी आदि चारि प्रकार जीव पृथ्वी -, अप - तेज - वायु इनि का शरीर, बहुरि केवली का शरीर, बहुरि आहारक शरीर, बहुरि देवनि का शरीर, बहुरि नारकीनि का शरीर ए सर्व निगोद शरीरनि करि अप्रतिष्ठित हैं; प्राश्रित नाहीं । इनि विर्षे निमोद शरीर न पाइए है। बहुरि अवशेष रहे जे जीव, लिनि के शरीर प्रतिष्ठित जानने । इनि विर्षे निगोद शरीर पाइए है । तातै अवशेष सर्व निगोद शरीरनि करि प्रतिष्ठित हैं, प्राश्रित हैं । तहां सप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पती, द्वींद्रिय, वींद्रिय, चतुरिद्रिय, पंचेंद्रिय, तिर्यच पर पूर्व कहे तिनि बिना अवशेष मनुष्य इनि सबनि के शरीर विष निगोद पाइए हैं । आगै स्थावरकायिक, सकायिक जीवनि के शरीर का आकार कहैं हैं- ' मसुरंबुबिंबुसूई-कलावधयसण्णिहो हवे देहो। . पुढवीप्रादिचउण्ह, तरुतसकाया अणेयविहा ॥२०१५ . मसूरांबुदिदुसूचीकलापध्वजसन्निभो भवेद्देहः । पृथिव्यादिचतुराँ, तरुत्रसकाया अनेकविधाः ।। २०१॥ ... टोका - पृथिवीकायिक जीवनि का शरीर मसुर अन्न समान गोल आकार धर है । बहुरि अपकायिक जीवनि का शरीर जल की बूंद के समान गोल आकार धरे है । बहुरि अग्निकायिक जीवनि का शरीर सुईनि का समूह के समान लंबा भर ऊर्ध्व दिर्षे चौड़ा बहुमुखरूप प्राकार धरै है । बहुरि वातकायिक जीवनि का शरीर
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy