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________________ २२. 1 [गोमसार शोषकाम गाथा ११२ उत्कृष्ट स्थान, सो अंत जानना । तदां 'पादो. अंते सुद्धे वहिहिदे स्थसंजुदे ठाणे' इस करण सूत्र करि आदि का प्रमाण कौं अंत का प्रमाण समच्छेद विर्षे अपवर्तनादि विधान करि घटाए जो अवशेष प्रमाण रहै, ताकौं स्थान-स्थान प्रति वृद्धिरूप जो एक प्रदेश, ताका भाग दीए भी तेता ही रहै, तामैं एक जोडें जो प्रमाण होइ, तितने सूक्ष्म निगोद लब्धि अपर्याप्तक जीवनि के सब अवगाहना के भेद हैं । इनिमैं आदि स्थान पर अंत स्थान, इनि दोऊनि कौं घटाये अवशेष तिस ही जीव के मध्यम अवगाहना के स्थान हो हैं । बहुरि इस ही प्रकार सूक्ष्म लब्धि अपर्याप्तक वायुकायिक जीव आदि देकरि संजी पंचेंद्री पर्याप्त पर्यंत जीवनि के अपने-अपने जघन्य अवगाहना स्थान ते लगाइ, अपने-अपने उत्कृष्ट अवगाहना स्थान पर्यंत सर्व अवगाहना के स्थान, अर तिनि विर्षे जघन्य-उत्कृष्ट दोय स्थान घटाये तिन ही के मध्य अवगाहना स्थान, ते सूत्र के अनुसारि ल्याईये । अब मत्स्यरचना के मध्य प्राप्त भए ऐसे सर्व अवगाहना स्थान, तिनिके स्थापना का अनुक्रम कहिये है। पूर्व अवगाहना के स्थान चौसठि कहे थे, तिनि विर्षे ऊपरि की पंक्ति विर्षे प्राप्त जे बियालीस गुणकाररूप स्थान, सिनिकौं मुरिणत क्रमस्थान कहिये । बहुरि नीचे की दोय पंक्तिनि विर्षे प्राप्त जे बावीस अधिकरूप स्थान, तिनिकौं अधिक स्थान कहिये। तहां चौसाठि स्थाननि विर्षे युरिणत क्रमरूप बा श्रधिकरूप स्थान अपने-अपने जघन्य तें लगाइ अपने-अपने उत्कृष्ट पर्यंत जेतेजेते होइ, तिनि एक-एक स्थान की दोय-दोय बिंदी बरोबरि लिखनी; जाते एक-एक स्थान के बीचि अवगाहना के भेद बहुत हैं । तिनिकी संदृष्टि के अथि दोय बिंदी स्थापी, बहुरि तिनि जीवसमासनि विर्षे संभवले स्थाननि की नीचे-नीचे पंक्ति करनी। ऐसे स्था माछलेकासा आकार हो है, सो कहिए है । ( देखिए पृ४ २२६-२३०) . प्रथम सूक्ष्म निमोद लब्धि अपर्याप्त का जघन्य अवगाहन स्थान से लगाइ ताही का उत्कृष्ट पर्यत सतरह स्थान हैं। तहां सोलह गुरिणत स्थान हैं। एक अधिकस्थान है । सो प्रथमादि एक-एक स्थान की दोय-दोय बिंदी की संदृष्टि करने करि चौंतीस बिदी बरोबरि ऊपरि पंक्ति विर्षे लिखनी ।हां सूक्ष्म निगोद 'लब्धि अपर्याप्त का जघन्य स्थान पहला है, उत्कृष्ट अठारहवां है, तथापि गुणाकारपना वा अधिकपनारूप. अंतराल सतरह ही है; तातै सतरह ही स्थान ग्रहे हैं। ऐसे आगे भी जानना । बहुरि तसे ही तिस पंक्ति के नीचे दूसरी पंक्ति विषं सूक्ष्म लब्धि अपर्याप्तक वायुकायिक जीव का जघन्य अवगाहना स्थान से लगाइ ताके उत्कृष्ट
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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