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________________ सम्मानपरिका माटोका ] [ २०७ विषे प्राप्त जे अवगाहना के स्थान ते अधिक अनुक्रम घरें हैं। तहां सूक्ष्म निगोद पर्याप्त की उत्कृष्ट अवगाहना के स्थान की आदि देकरि उत्तर-उत्तर स्थान पूर्वपूर्व प्रवगाहना स्थान तें ताही को आवली का असंख्यातवां भाग का भाग दीए, तहां एक भागमात्र अधिक हैं । पूर्वस्थान को भायली का असंख्यातवां ( भाग का) भाग दीए जो प्रमाण होइ, तितना पूर्वस्थान विर्षे अधिक कीए उत्तरस्थान विषै प्रमाण हो है । इहां अधिक का प्रमाण ल्यावने के अर्थि भागहार वा भागहार का भागहार, सो Heat का असंख्यातवां भाग प्रमाण है । स परमगुरु का उपदेश तें चल्या श्राया प्रमाण जानना । बहुरि यहां यह जानना - सूक्ष्मनियोदिया का तीनों पंक्ति विषै अनुक्रम करि पीछे सूक्ष्म वातकायिक का तीनों पंक्तिनि विषै अनुक्रम करना । से हो क्रम तें ग्यारह जीवसमासान का अनुक्रम जानता । यह यंत्र जीवसमासनि की श्रवगाहना का है । इहां ऊपरि की पंक्ति विषे प्राप्त बियालीस स्थान गुरणकाररूप | तहां पहला, चौथा कोठा विषं सूक्ष्म जीव कहे, ते क्रम ते पूर्वस्थान तें उत्तरस्थान आवली का असंख्यातवां भाग करि मुति है । बहुरि दूसरा, तीसरा, सातवां कोठा विषे बादर कहे घर दशवां कोठा विषे अप्रतिष्ठित प्रत्येक वा बेंद्री कहे, ते क्रम तैं पल्य के असंख्यातवां भाग करि गुखित हैं । बहुरि दशवां कोठा विषै तेंद्री सौं लगाइ बारहवां कोठा विषै प्राप्त पंचेंद्री पर्यंत संख्यात करि गुणित हैं । बहुरि नीचली दोय पंक्तिनि के व्यारि कोठानि विषे जे स्थान कहे, ते आवली का संख्यातवां भाग करि भाजित पूर्वस्थान प्रमाण अधिक हैं । ( देखिए पृष्ठ २०६ ) अब इहां कहे जे अवगाहना के स्थान, तिनके गुरणकार का विधान कहिए | सूक्ष्म निगोदिया लब्धि पर्याप्तक की जघन्य अवगाहना का स्थान, सो आगे कहैंगे गुणकार, तिनकी अपेक्षा अंसा है । उगणीस बार पत्य का भाग, नव बार श्रावली का प्रसंख्यातवां भाग, बाईस बार एक अधिक भावली का असंख्यातवा भाग, तब बार संख्यात, इनिका तो जाक भाग दीजिए। बहुरि बाईस बार प्रावली का असंख्यातवां भाग करि जार्को गुणिए जैसा जो घनांगुल, तीहि प्रमाण है, सो arat after स्थान स्थापि, यातें सूक्ष्म अपर्याप्तक वायुकायिक जीव का जघन्य अवगाहना स्थान आवली का असंख्यातवां भाग करि गुपित है, सो याका गुणकार आली का असंख्यातवां भाग श्रर पूर्वे श्रावली का प्रसंख्यातवां भाग का भागहार १ छपी हुई प्रति में 'ग्यारहवां अन्य यह हस्तलिखित प्रतियों में 'वारा' है । !
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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