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________________ D r . ARA २०८ ] [ गोम्मटसार जीवकाण्ड गाथा १०१ नक बार कहा था, तामैं एक बार पावली का असंख्यातवां भाग सदृश देखि दोऊनि का अपवर्तन कीए, पूर्व जहां नव बार कहा था, तहां इहां आठ बार पावली का असंख्यातवां भाग का भागहार जानना । जैसे ही प्रामें भी गुणकार भागहार की समान देखि, तिनि दोऊनि का अपवर्तन करना । बहुरि यातें सूक्ष्म अपर्याप्त तेजस्कायिक की जघन्य अवगाहना स्थान पावली का असंख्यातवां भाग गुणा है । इहां भी पूर्वोक्त प्रकार अपवर्तन कीए पाठ बार की जायगा सात बार पावली का असंख्यात भाग का भागहार हो है । बहुरि यातें सूक्ष्म अपर्याप्त अप्कायिक का जघन्य अवगाहना स्थान आवली का असंख्यातवां भाग गुणा है । इहां पूर्ववत् अपवर्तन करना । बहुरि यात सूक्ष्म अपर्याप्त पृथ्वीकाधिक का जवन्य अवगाहना स्थान आवली का असंख्यातवां भाग गुरणा है । इहां भी पूर्ववत् अपवर्तन करना । असे इहां प्रावली का असंख्यातवां भाग का भागहार तो पांच बार रहा, अन्य सर्व गुणकार भागहार पूर्ववत् जानने । बहुरि इहां पर्यंत सूक्ष्म से सूक्ष्म का गुणकार भया, ताः स्वस्थान गुणकार कहिए है । अब सूक्ष्म ते बादर का गुणकार कहिए है, सो यहु परस्थान गुणकार जानना । प्रागै भी सूक्ष्म ते बादर, बादर से सूक्ष्म का जहां मुणकार होइ, सो परस्थान मुणकार है; असा विशेष जानना । बहुरि इस सूक्ष्म अपर्याप्त पृथिवीकायिक का जघन्य अवगाहन स्थान ते स्वस्थान गुणकार की उलंघि परस्थानरूप बादर अपर्याप्त वातकायिक का जघन्य अवगाहना स्थान पत्य का असंख्यातवा भाग गुरणा है । इहां इस गुणकार करि उगणीस बार पल्य का असंख्यातवां भाग का भागहार था, तामें एक बार का अपवर्तन करना । बहुरि यातै बादर तेज कायिक अपर्याप्तक का जघन्य अवगाहना स्थान पल्य का असंख्यातवां भाग गुणा है । इहां भी पूर्ववत् अपवर्तन करना । जैसे ही पल्थ का असंख्यातवां भाग गुणा अनुक्रम करि अपर्याप्त बादर, अप्, पृथ्वी, निगोद, प्रतिष्ठित प्रत्येकनि के जघन्य अवगाहना स्थान, अर अपर्याप्त अप्रतिष्ठित प्रत्येक, बेंद्री, तेंद्री, चौइंद्री पंचेंद्री, के जघन्य अवगाहना स्थान, इन नव स्थानकनि कौं प्राप्त करि पूर्ववत् अपवर्तन करते अपर्याप्त पंचेंद्रिय का जघन्य अवगाहना स्थान विर्षे आठ बार पल्य का असंख्यातवां भाग का भागहार रहै हैं । अन्य भागहार गुणकार पूर्ववत् जानना । बहुरि यातें सूक्ष्म निगोद पर्याप्त का जघन्य अवगाहना स्थान, सो परस्थानरूप पावली का असंख्यातवां भाग मुगा है । सो पूर्व प्रावली का असंख्यातवां भाग का भागहार पांच बार रहा था, तामें एक बार करि इस गुणकार का अपवर्तन करना ।
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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