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________________ सम्यग्ज्ञामचन्द्रिका भरपाटीमा [ २०५ पुण्णजहणणं तत्तो, बरं अपुण्णस्स पुण्णउक्कस्सं। बीपुण्णजहण्णो ति, असंखं संखं गुणं तत्तो ॥१०॥ पूर्णजघन्यं ततो, वरमपूर्णस्य पूर्णोत्कृष्टं । द्विपूर्णजघन्यमिति असंख्य संख्यं गुणं ततः ॥१०॥ टीका - ताके आगें दशवां कोठा विर्षे प्राप्त पर्याप्त पांच जीवसमासनि की जघन्य अवगाहना के स्थान हैं । बहुरि तहां तें प्रागै ग्यारहवां कोठा विर्षे अपर्याप्त पांच जीवसमासनि की उत्कृष्ट अवगाहना के स्थान हैं। बहुरि ताके प्रागै बारहवां कोठा विर्षे पर्याप्त पंच जीवसमासनि की उत्कृष्ट अवगाहना के स्थान हैं । जैसे ए कहे स्थान, तिनि विर्षे प्रथम कोठा विर्षे प्राप्त सूक्ष्म अपर्याप्त निगोदिया जीद की जघन्य अवगाहना त लगाइ दशवा कोठा विर्षे प्राप्त बादर पर्याप्त द्वींद्रिय की जघन्य अवगाहना पर्यंत ऊपरि की पंक्ति संबंधी गुणतीस अवगाहना के स्थान, ते असंख्यातअसंख्यात गुणा क्रम लीए है। बहुरि तिसते प्रागै बादर पर्याप्त पंचेंद्रिय की उत्कृष्ट अवगाहना पर्यंत तेरह अवगाहना के स्थान, ते संख्यालगुणां, संख्यातगुणां अनुक्रम लीए हैं; जैसा जानना । सुहमेदरगुरणगारो, आवलिपल्ला असंखभागो दु । सट्ठाणे सेढिगया, अहिया तत्थेकपडिभागो॥१०१॥ सूक्ष्मेतरगुणकार, श्रावलिपल्यासंख्येयभागस्तु । स्वस्थाने श्रेणिमता, अधिकास्तकप्रतिभागः ॥१०१॥ टीका -- इहां गुणतीस स्थान असंख्यातगुणे कहे, तिनिविर्षे जे सूक्ष्म जीवनि के अवगाहना के स्थान हैं, ते पावली का असंख्यातवां भाग करि गुणित जानने । पूर्वस्थान कौं धनावली १ का असंख्यातवां भाग करि तहां एक भाग करि गुण उत्तर स्थान हो है । बहुरि जे बादर जीवनि के अवगाहन के स्थान हैं, ते पत्य का असंख्यातवां भाग करि गुरिणत हैं । पल्य का असंख्यात भाग करि तहां एक भाग करि पूर्वस्थान कौं गुणें, उत्तर स्थान हो हैं। असे स्वस्थान विर्षे मुरणकार हैं, या प्रकार असंख्यात का गुणकार विर्षे भेद है, सो देखना । बहुरि नीचली दूसरी, तीसरी पंक्ति १. मप्रति में 'प्रावली' है, बाकी चार प्रतियों में 'धनावली' है।
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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