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________________ i tso अब कहे भेदनि की यंत्र में रचना अंकनि करि लिखिये है । retareefore भाघाटीका 1 की विवक्षा कौं न करि सामान्य आलाप करि गुररानी । बहुरि दूसरी पंक्ति दोय जे पर्याप्त, अपर्याप्त भेद, तिनि करि गुनी । बहुरि प्रथमा कहिए तीसरी पंक्ति, सो तीन जे पर्याप्त, निर्वृति अपर्याप्त लब्धि पर्याप्त भेद तिनि सामान्य करि गुनी । इहां दूसरी, तीसरी दोय पंक्ति अप्रथमा हैं । तथापि दूसरी पंक्ति स्थान कांठे ही कही, तीहिरि प्रथमा से शब्द करि अवशेष रही पंक्ति तीसरी सोई ग्रहण करी है । अपेक्षा भावार्थ एक कौं आदि देकर उगणीस पर्यन्त जीवसमास के स्थान कहे । तिनिका सामान्यरूप ग्रहण कीएं एक आदि एक-एक बधते उगणील पर्यन्त, स्थान हो हैं । इहां सामान्य विषै पर्याप्तादि भेद गर्भित जानने । बहुरि तिन ही एक-एक के पर्याप्त, पर्याप्त भेद कीए दोय कौं आदि देकरि दोय-दोय बघते अडतीस पर्यन्त स्थान हो हैं । इहां अपर्याप्त विनिर्वृत्ति पर्याप्त, लब्धि पर्याप्त दोऊ गर्भित जानने । बहुरि तिन ही एक-एक के पर्याप्त, निर्वृत्ति अपर्याप्त, लब्धि अपर्याप्त भेद कीये तिनिक आदि देकर तीन-तीन बघते सत्तावन पर्यन्त स्थान हो हैं । इहां जुदे जुदे भेद जानने । ३ મ ५ ७ ५ € १० ११ जीवसमास के स्थानकनि का मंत्र १२ १३ १४ १५ १६ १७ १८ १६ १६०: पर्याप्त, अपर्याप्त अपेक्षा स्थान 片 १० १२ १४ १६ १८ २० २२ २४ २६ २८ ३२ ३४ ३६ ३५ ३८० पर्याप्त, निर्वृत्ति अपर्याप्त, लब्धि अपर्याप्त अपेक्षा स्थान ३ १२ १५ १८ २१ २४ २७ ३० ३३ ३६ ३६ ४२ ४५ ४८ ५. १ .५४ ५७ ५७०
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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