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________________ १६० ] [ गोम्मटसार जीवकाण्ड गाथा ५७ मान जे सर्व जीव, ते हीन- अधिकपना तैं रहित समान विशुद्ध परिणाम धरें हैं । तहां समय-समय प्रति ते विशुद्ध परिणाम अनंतगुणे - अनंतगुणे उपजे हैं। तहां प्रथम समय विषं जे विशुद्ध परिणाम हैं; तिनतें द्वितीय समय विषे विशुद्ध परिणाम अहो हैं । पूर्व-पूर्व समयवर्ती विशुद्ध परिरणामनि तैं जीवनि के उत्तरोत्तर समयवर्ती विशुद्ध परिणाम श्रविभागप्रतिच्छेदनि की अपेक्षा अनंतगुणा - अनंतगुणा अनुक्रम करि बधता हुआ प्रवर्ते हैं। ऐसा यहु विशेष जैनसिद्धांत विषे प्रतिपादन किया है, सो प्रतीति में ल्यावना । भावार्थ - प्रनिवृत्तिकरण विषै एक समयवर्ती जीवनि के परिणामनि विषै समानता है । बहुरि ऊपर-ऊपरि समयवर्तीनि के अनंतगुणी - अनंतगुणी विशुद्धता बघती है । ताका उदाहरण - जैसे जिनको अनिवृतिकरण मांडे पांचवां समय भया, ऐसे त्रिकालवर्ती अनेक जीव, तिनकें विशुद्ध परिणाम परस्पर समान ही हों, कदाचित् eta after it | बहुरि ते विशुद्ध परिणाम जिनकौं अनिवृत्तिकरण मांडें चौथा समय भया, तिनकै विशुद्ध परिणामनि तें अनंतमुणे हैं । बहुरि इनतें जिनको अनिवृत्तिकरण मांडें छठा समय भया, तिनकें अनंतगुणे विशुद्ध परिणाम हो है; ऐसे सर्वत्र जानना । बहुरि तिस अनिवृत्तिकरण परिणाम संयुक्त जीव, ते अति निर्मल ध्यानरूपी हुतभुक् कहिए अग्नि, ताकी शिखानि करि दग्ध कीए हैं कर्मरूपी वन जिनने ऐसे हैं । इस विशेषण करि चारित्र मोह का उपशमावना वा क्षय करना अनिवृत्तिकरण परिणामनि का कार्य है; ऐसा सूच्या है । आगे सूक्ष्म सांपराय गुणस्थान के स्वरूप को कहे हैं - धुदको भयवत्थं, होदि जहा सुहमरायसंजुत्तं । एवं सुहमकसा, सुहमसरागो त्ति गादव्वो ॥५८॥ starte raft यथा सूक्ष्मरागसंयुक्त' । एवं सूक्ष्मकषायः, सूक्ष्मसांवराय इति ज्ञातव्यः ॥५८॥ टीका - जैसे धोया हुआ कमल वस्त्र, है । तैसें अगिला सूत्र विषै कह्या विधान करि कषाय, ताहिकरि जो संयुक्त, सो सूक्ष्मसांपराय है। सो सूक्ष्म लाल रंग करि संयुक्त हो सूक्ष्म कृष्टि को प्राप्त जो लोभ ऐसा जानना ।
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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