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________________ कार भाषाटीका ] १५६ - अर्थ यहु जो उपशम श्रेणी चढनेवाले अपूर्वकरण जीव का प्रथम भाग विषै मरण न होइ, बहुरि निद्रा प्रचला का बंघ व्युच्छेद होइ, तिसको होते ते प्रपूर्वकर गुस्थानवर्ती जीव जो उपशम श्रेणी प्रति न तो चारित्रमोह को नियमकरि उपशमावे है | बहुरि क्षपक श्रेणी प्रति चढनेवाले क्षपक, ते नियम करि तिस चारित्र मोह को क्षपावें हैं । बहुरि क्षपक श्रेणी विषै सर्वत्र नियमकरि मरण नाहीं है । is आगे श्रनिवृत्तिकरण गुणस्थान का स्वरूप क गाथा दोय करि प्ररूप हैं एक कालसमये, संठारणादीहिं जह रिपवति । ग स्विट्टति तहादि य, परिणामेहिं मिहो जेहिं ॥५६॥ होति से, पसिभयं जेस्सिमेक्कपरिणामा । विमलयराणहुयवहसिहाहि किम्मवणा ॥ ५७॥ एकस्मिन् कालसमये, संस्थानादिभिर्यथा निवर्तते । न निवर्तते तथापि च, परिणार्मेसियो यैः ॥५६॥ (जुग्मम् ) भवंत अfrared प्रतिसमयं देवामेकपरिणामाः । वितरध्यान हुतवह शिलाभिनिर्वग्वकर्मवनाः ११५७१२ ( युग्मम् ) टीका - प्रनिवृत्तिकरण काल विषै एक समय विषै वर्तमान जे त्रिकालवर्ती अनेक जीव, ते जैसे शरीर का संस्थान, वर्ण, वय, अवगाहना र क्षयोपशमरूप ज्ञान उपयोगादिक, तिनकरि परस्पर भेद को प्राप्त हैं; तैसे विशुद्ध परिगामनि करि भेद कौं प्राप्त न हो हैं प्रगटपर्ने, ते जीव अनिवृत्तिकरण हैं, जैसे सम्यक् जानना । जातें नाहीं विद्यमान है. निवृत्ति कहिए विशुद्ध परिणामनि विषै भेद जिनकें, ले अनिवृत्तिकरण हैं, ऐसी निरुक्ति हो है । भावार्थ - जिन जीवनि को अनिवृत्तिकरण मांहें पहला, दूसरा आदि समान समय भए होंहिं, तिनि freeर्ती अनेक जीवनि के परिणाम समान ही होंइ । जैसे अधःकरण, अपूर्वकरण विषे समान वा ग्रसमान होते थे, तसे इहां नाहीं । .. बहुरि अनिवृत्तिकरण काल का प्रथम समय को आदि देकर समय-समय प्रति वर्त ३. एडम्स - वला पुस्तक १, पृष्ठ १८७ गाथा १२, २० 1
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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