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________________ ४८ समयसार प्रात्मानुभूतिरिति शुद्धनयात्मिका या ज्ञानानुभूतिरियमेव किलेति बुवा । प्रात्मानमात्मनि निवेश्य सुनिष्प्र कंपमेकोस्ति नित्यमबबोधघनः समंतात् ।।१३।। नीहि-वि-जानीहि-लोट् आज्ञार्थ मध्यम पुरुष एकवचन ॥१४॥ दृष्टि--१- परद्रव्यादिग्राहक द्रव्याथिकनय (२६): २-परमभावग्राहक द्रव्यार्थिवनय (३०) । ३-- उत्पादव्ययगौणसत्ताग्राहक द्रव्याथिकनय (२२)। ४- भेदकल्पनानिरपेक्ष शुद्ध द्रव्याथिकनय (२३) । ५-- उपाधिनिरपेक्ष शुद्ध द्रव्याथिकनय (२१)। प्रयोग - उपाधिका निमित्त पाकर होने वाले विभावोंसे पृथक तथा प्रतिबोधके लिये किये जाने वाले भेदविकल्पोंसे परे शुद्ध शायकस्वभावमय प्रात्माकी शुद्धनयके प्रालम्बनसे उपासना करना चाहिये ।।१४॥ __ शुद्धनपके विषयभत प्रात्माकी जो अनुभति है, वही ज्ञानको अनभात है, ऐसा मागे को गाथाको उत्थानिकारूप काव्य कहते हैं 'प्रात्मानुभूति' इत्यादि । अर्थ—इस प्रकार जो पूर्वकथित शुद्धनय स्वरूप प्रात्माजी अनुभूति है, वही इस सालो अनुभूति है, ऐसा अच्छी तरह जानकर तथा आत्मामें आत्माको निश्चल स्थापित करके सदा सब तरफ ज्ञानघन एक प्रात्या ही है, इस प्रकार देखना चाहिये । भावार्थ-पहिले सम्यग्दर्शनको प्रधान मानकर आत्मतत्त्व कहा गया था, अब ज्ञानको मुख्य करके कहते हैं कि यह शुद्धनयके विषयस्वरूप आत्माकी अनुभूति है वही सम्यग्ज्ञान है । अब इसीको गायासे स्पष्ट करते हैं (यः) जो (प्रात्मानं) प्रात्माको (प्रबद्धस्पृष्टं) प्रबद्धस्पृष्ट (अनन्यं) अनन्य (अविशेष) अविशेष तथा पूर्वगाथामें कथित नियत और असंयुक्त (पश्यति) देखता है वह (अपदेशसूत्रमध्य) द्रव्यश्रुत और भावश्रुत रूप अथवा शब्दसमयसे वाच्य व ज्ञानसमयसे परिच्छेद्य (सर्व जिनशासन) समस्त जिनशासनको (पश्यत्ति) देखता है । तात्पर्य-जिनशासनका उद्देश्य सहज सिद्ध केवल अन्तस्तत्वको प्रसिद्ध करना है। टीकार्थ-प्रबद्धस्पृष्ट, अनन्य, नियत, अविशेष और असंयुक्त--ऐसे पाँच भावरूप आत्माको जो यह अनुभूति है, वही निश्चयसे समस्त जिनशासनको अनुभूति है। क्योंकि श्रुतज्ञान स्वयं प्रात्मा ही है, इसलिये जो यह ज्ञानको अनुभूति है बही प्रात्माको अनुभूति है । किन्तु सामान्यज्ञानाकार तो प्रकट होने और विशेष ज्ञेयाकार ज्ञानके आच्छादित होनेसे इस विधिसे ज्ञानमात्र ही अनुभवमें आनेपर भी जो अज्ञानी है व ज्ञेयों (पदार्थों) में प्रासक्त हैं, उनको वह नहीं रुचता । वह इस प्रकार है-जैसे अज्ञानी व्यञ्जनलोभी लोकोंको अनेक तरहके शाक प्रादि भोजनोंके सम्बन्धसे उत्पन्न सामान्य लवएका तिरोभाव (प्रप्रकटता) तथा
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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