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________________ ३२ समयसार तेषां पर्यन्तपाकोत्तीर्णजात्यकार्तस्वरस्थानीय परमभावानुभवनशून्यत्वादशुद्धद्रव्यादेशितयोपशितप्रतिविशिष्टकभावानेकभावो व्यवहारनयो विचित्रवर्णमालिकास्थानीयत्वात्परिज्ञायमानस्तदात्वे प्रयोजनवान्, तीर्थतीर्थफलयोरित्थमेव व्यवस्थितत्वात् । उक्तं च--जइ जिणमयं पवजह देश, परमभावदर्शिन, व्यवहारदेशित. पुनस्, यत, तु, अपरम, स्थित, भाव । मूलधातु --- शिर् अवलोकने, [पुनः] और [ये तु] जो जीव [ अपरमे भावे] अपरमभाव में अर्थात् श्रद्धा, ज्ञान और चारित्र के पूर्ण जाचको नहीं पहुंच मागे मी पादापा, नणा साधक अवस्था हो [स्थिताः] ठहरे हुए हैं वे [व्यवहारदेशिताः] व्यवहार द्वारा उपदेश करने योग्य हैं । तात्पर्य-प्राक् पदवीमें व्यवहारलयका उपदेश प्रयोजनवान् है ! . टोकार्थ- जो पुरुष अन्तिम पाकसे उतरे हुए शुद्ध सोनेके समान वस्तुके उत्कृष्ट प्रसाधारण भावका अनुभव करते हैं उनको प्रथम द्वितीय आदि अनेक पाकोंको परम्परासे पच्यमान (पकाये जाते हुए) अशुद्ध सुवर्णके समान अपरमभावका अर्थात् अनुत्कृष्ट मध्यम भावका अनु. भव नहीं होता। इस कारण शुद्धद्रव्यका ही कहने वाला होनेसे जिसने प्रचलित प्रखंड एकस्वभावरूप एक भाव प्रकट किया है, ऐसा शुद्धनय ही उपरितन एक शुद्ध सुवर्णावस्थाके समान जाना हुमा प्रयोजनवान् है । परन्तु जो पुरुष प्रथम द्वितीय आदि अनेक पाकोंको परम्परासे पच्यमान अशुद्ध सुवर्णके समान बस्तुके अनुत्कृष्ट मध्यम भावका अनुभव करते हैं उनको अन्तिम पाकसे उतरे हुए शुद्ध सुवर्ण के समान वस्तुके उत्कृष्ट भावका अनुभव न होनेसे उस कालमें जाना हुया व्यवहारनय ही प्रयोजनवान है । (क्योंकि व्यवहारनय अशुद्ध द्रव्यको कहने वाला होनेसे भिन्न-भिन्न एक एकभावस्वरूप अनेकभाव दिखलाता है तथा वह विचित्र अनेक वर्णमालाके समान है। इस तरह अपने-अपने समयमें दोनों ही नय कार्यकारी हैं) क्योंकि तीर्थ और तीर्थके फलकी ऐसी हो व्यवस्थिति है । (जिससे तरा जावे वह तीर्थ है, ऐसा तो व्यवहार धर्म है और जो पार होना वह व्यवहारधर्मका पल है नथवा अपने स्वरूप का पाना वह तीर्थफल है)। ऐसा ही दूसरी जगह भी 'जइ जिणमयं' इत्यादि गाथामें कहा है । अर्थ-यदि तुम जैनधर्मका प्रवर्तन चाहते हो तो व्यवहार और निश्चय इन दोनों नयोंको मत छोड़ो, क्योंकि एक व्यवहारनयके बिना तो तीर्थ याने व्यवहारमार्गका नाश हो जायगा चिह्नित जिनेन्द्र भगवानके वचनमे जो पुरुष रमण करते हैं---प्रचुर प्रीतिसहित अभ्यास करते हैं, वे पुरुष स्वयं मिथ्यात्व-कर्मके उदयका वमन करते हुए इस उत्कृष्ट परमज्योतिस्वरूप सनातन सर्वथा एकांतरूप कुनयके पक्षसे खंडित नहीं होने वाले समयसारको निरखते हैं । भावार्थ--जिनवचन स्यावादरूप हैं, जहाँ दो नयोंके विषयका विरोध है, जैसे जो ।
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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