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________________ समयसार सुद्धो सुद्धादेसो णायब्बो परमभावदरिसीहि । ववहारदेसिदा पुण जे दु अपरमे हिदा भावे ॥१२॥ शुद्ध शुद्धदेशक नय--को जानो परमभावदर्शी गण । जो अपरममावस्थित, उनको व्यवहारवेशन है ॥१२॥ शुद्धः शुद्धादेशो ज्ञातव्यः परमभावशिभिः । व्यवहारदेशिताः पुनर्ये त्वपरमे स्थिता भावे ।।१२॥ ये खलु पर्यंतपाकोत्तीर्णजात्यकात्तस्वरस्थानीयं परमं भावमनुभवंति, तेषां प्रथमद्वितीयाद्यनेकपाकपरम्परापत्त्यमान कार्तस्वरानुभवस्थानीयपरमभावानुभवनशून्यत्वाच्छुद्धद्रव्यादेशितया __ नामसंज्ञ--- सुद्ध, सुद्धादेस, णायब्व, परमभावरिसि, वबहारदेसिद, पुण, ज, दु, अपरम, भाव, से प्रकट हुए स्वाभाविक एक ज्ञायकभावपनेसे जिसमें एक ज्ञायकभाव प्रकाशमान है ऐसे शुद्ध प्रात्माका अनुभव करते हैं । इसलिए जो पुरुष शुद्धनयका प्राश्रय करते हैं वे ही सम्यक् अवलोकन करते हुए सम्यग्दृष्टि हैं और जो प्रशुद्धनयका सर्वथा प्राश्रय करते हैं वे सम्यग्दृष्टि नहीं हैं, क्योंकि शुद्धनय निर्मली द्रव्यके समान है। इस कारण कर्मसे भिन्न प्रात्माको जो देखनाः चाहते हैं उन्हें व्यवहारनय अंगीकार नहीं करना चाहिये । भावार्थ---यहाँ व्यवहारनयको अभूतार्थ और शुद्धनयको भूतार्थ कहा है । जो सहज अस्तित्वमय है उसे भूतार्थ कहते हैं और जो सहज नहीं है, किन्तु औपाधिक है उसे अभूतार्थ कहते हैं । इसका अभिप्राय यह है कि शुद्धनयका विषय सहज अभेद एकाकाररूप नित्य द्रव्य है इसकी दृष्टि में भेद नहीं दीखता । इसलिये इसकी दृष्टि में वह प्रभूतार्थ अविद्यमान-असत्यार्थ ही कहना चाहिये । यहाँ ऐसा समझिये कि जिनवाणी स्याद्वादरूप है, प्रयोजनके बसे नयको मुख्य गौण करके कहती है । भेदरूप व्यवहारका पक्ष तो प्राणियोंको अनादिकालसे है हो और उसका उपदेश भी बहुधा सभो परस्परमें करते हैं, किन्तु आगममें व्यवहारका उपदेश शुद्धनय का सहायक जानकर किया है। चूंकि शुद्धनयका पक्ष इस जीवने कभी नहीं ग्रहण किया तथा उसका उपदेश भी कहीं कहीं है, इसलिये भगवंतोने शुद्धनयके ग्रहणका फल मोक्ष जानकर इसीका उपदेश मुख्यतासे दिया है कि शुद्धनय भूतार्थ है, सत्यार्थ है, इमीका पाश्रय करनेसे सम्यग्दृष्टि हो सकता है, इसके जाने बिना व्यवहारमें जब तक मग्न है तब तक आत्माका ज्ञान श्रद्धानरूप निश्चयसम्यक्त्व नहीं हो सकता ।। प्रसङ्गविवरण-- शुद्ध शायकस्वरूप प्रातमा परमार्थ है उसको समझानेके लिये भेदविधिसे प्रतिपादन करने वाला व्यवहार प्रयोजनबान है, किन्तु परमभावदर्शी पुरुषोंको व्यवहारनय प्रयोजनवान नहीं, प्रतः व्यवहारनयका अनुसरण नहीं करना चाहिये यह प्रसंग इस
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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