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________________ सर्वविशुद्धशानाधिकार ६५५ पाखंडीलिंगेसु व गिहिलिंगेसु व बहुप्पयारेसु । कुव्बंति जे ममत्तं तेहिं ण णायं समयसारं ॥४१३॥ पाखण्डी लिङ्गोंमें, तथा विविध सब गृहस्थ लिङ्गोंमें । जो ममत्व करते उन को न समयसार ज्ञात हमा॥४१३॥ पाखंडिलिगेषु वा गृहिलिगेषु वा बहुप्रकारेषु । कुर्वति ये ममत्वं तैर्न ज्ञात: समयसारः ।। ४१३ ।। ये खलु श्रमणोऽहं श्रमणोघासकोऽहमिति द्रयलिंगममकारेण मिथ्याहसारं कुर्वन्ति तेऽनादिरूढव्यवहारविमूढा: प्रौढविवेकं निश्चयमनारुढा: परमार्थसत्यं भगवंतं समयसारं न नामसंश- पाखंडीलिंग, व, गिहिलिंग, व, बहुप्पयार, ज, ममत्त, त, ण, गाय, समयसार । धातुसंज्ञ-कुब्ब करणे, शा अवबोधने । प्रातिपदिक- पाखन्डिलिंग, वा, गृहिलिंग, व, बहुप्रकार, यत्, ममत्व, तत्, न, ज्ञात । मूलधातु-डुकृत्र करणे, ज्ञा अवबोधने । पदविवरण- पाखंडीलिंगेसु पाखण्डिलिगेषु गिहिही ज्ञानमें विमुग्ध बुद्धि वाले तुषको हो संचित करते हैं वे तंदुग्नको नहीं संचित करते हैं। भावार्थ--जो व्यवहारमें ही मूढ़ हो रहे हैं अर्थात् शरीरादि परद्रव्यको ही प्रात्मा जानते हैं वे परमार्थ प्रात्माको नहीं जानते ।। प्रागे इसी प्रर्थको काब्य में दृढ़ करते हैं-द्रयलिंग इत्यादि । प्रर्थ-द्रव्यलिंगके मोहसे अंधे हुए पुरुषोंके द्वारा समयसार नहीं देखा जा सकता; क्योंकि इस लोकमें द्रव्यलिंग तो अन्यद्रव्यसे होता है. और एक यह ज्ञान अपने आत्मद्रव्यसे होता है। भावार्य -- जो द्रव्यलिंगको ही अपना मानते हैं वे मोहान्ध हैं। प्रसंगविवरण- अनन्तरपूर्व गायामें देहादिविषयक रागद्वेषादिसे हटाकर दर्शन ज्ञानचारित्रस्वरूप साक्षात् मोक्षमार्गमें उपयुक्त कराया था। प्रब इस गायामें उसी मार्गकी दृढ़ताके लिये बताया है कि जो साक्षात् मोक्षमार्गसे इटकर द्रव्यलिङ्गोंमें ममत्व करता है उसने समयसार ही नहीं जाना, फिर उसका कल्याण होगा ही कैसे ? तथ्यप्रकाश–१- मै मुनि हूं इस प्राशयमें द्रव्यलिङ्गके प्रति दृढ़ ममत्व बसा हुमा है । २-मैं श्रमणोपासक हूँ, श्रावक हूं इस माशयमें भी श्रावकवेशरूप द्रब्यलिङ्गमें दृढ़ ममत्व बसा हुआ है । ३-द्रव्यलिन में ममत्व होनेसे मिथ्या अहंकारकी वृत्ति जगतो रहती है । ४-वेशमें अहंकार करने वाले मुग्ध पुरुष विवेकसे च्युत रहते हैं। ५- द्रव्यलिङ्गकी ममता वाले मिथ्याहंकारी अविवेकी पुरुष परमार्थसत्य भगवान समयसारको निरख नहीं सकते। ६- जो व्यवहारमें ही विमूढ हो गये हैं वे परमार्थ सहजामस्वरूपपर दृष्टि भी नहीं कर पाते । ५-सहजात्मस्वरूपको दृष्टि, प्रतीति, रुचि, अनुभूति बिना मोक्षमार्गका प्रारम्भ भी नहीं
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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